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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 11
मूर्ध्नि स्फुरत्तुहिनदीधितिदीप्तिदीप्तं मध्ये ललाटममरायुधरश्मिचित्रम् । हृच्चक्रचुम्बि हुतभुक्कणिकाऽनुरूपं ज्योतिर्यदेतदिदमम्ब ! तव स्वरूपम् ।।
हे माता ! समस्त प्राणियों के ब्रह्मांड स्थान में जो ज्योति चन्द्रमा की किरणों की कांति के समान विकसित बनी हुई है, तथा प्राणियों के मस्तक के बीच में इन्द्र-धनुष की नाई रंग-बिरंगी अनेक रश्मियों से युक्त जो प्रकाश ठहरा रहता है, एवं प्राणियों के हृदय-स्थान में ठहरी हुई अग्नि के कणों की भांति जो ज्योति अवस्थित है, वे सभी प्रकाश, वास्तव में आपके ही स्वरूप हैं। भाव यह है कि 'ऐं, क्लीं, सौः' - ये आपके बीजाक्षर आपके स्वरूप को ही दिखाते हैं।
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