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पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 19
ध्याताऽसि हैमवति ! येन हिमांशुरश्मि- मालाऽमलद्युतिर ऽकल्मष मानसेन। तस्याविलम्बमनवद्यमनल्पकल्प- मल्पैर्दिनैः सृजसि सुन्दरि ! वाग्विलासम् ।।
हे हिमालय की पुत्री ! हे सुन्दरी ! जिस भक्त ने चन्द्रमा की किरणावलि की भांति निर्मल प्रकाश से युक्त आपके स्वरूप का ध्यान निष्पाप मन से अर्थात् निर्विकल्प मन से किया हो, उसे आप थोड़े ही दिनों में कविता का प्रसर सृजन करती हैं, जो कविता का प्रसर श्रुति-कटु इत्यादि दोषों से रहित तथा प्रसाद आदि गुणों से संपन्न एवं अस्खलित और धारावाहिक रूप से प्रसरणशील होता है।
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