मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
पञ्चस्तवी • अध्याय 2 • श्लोक 27
त्वद्रूपैकनिरूपणप्रणयिताबन्धो दृशोस्त्वगुण- ग्रामाकर्णनरागिता श्रवणयोस्त्वत्संस्मृतिश्चेतसि । त्वत्पादार्चनचातुरी करयुगे त्वत्कीर्तनं वाचि मे कुत्रापि त्वदुपासनव्यसनिता मे देवि ! मा शाम्यतु ।।
हे देवी! मेरे नेत्रों में केवल-मात्र आपके रूप का निर्णय करने का चाव बना रहे। मेरे कानों में आपके गुणानुवाद सुनने में ही राग अहर्निश प्राप्त हो। मेरे मन में केवल आपका हो स्मरण बना रहे। मेरे दोनों हाथों में आपके चरणों को पूजा करने की चतुरता प्राप्त हो जाये और मेरी वाणी आपकी गुण-कीर्तना ही करती रहे। इस रीति से मेरी इन्द्रियों को इस आपको उपासना करने की टॅव (आदत) कभी भी कम न हो अर्थात् सदा बनी रहे। भाव यह है कि मैं अपने समस्त जीवन-काल में आपकी पूजा के अतिरिक्त अन्य कोई भी व्यवहार न करूं।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
पञ्चस्तवी के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

पञ्चस्तवी के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें