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अध्याय 69 — अथ पञ्चमनुष्यविभागाध्यायः

बृहत्संहिता
40 श्लोक • केवल अनुवाद
स्थान, दिक्, चेष्टा और कालबल से युक्त मंगल आदि पाँच ग्रह अपने गृह या उच्च में स्थित होकर लग्न, चतुर्थ, सप्तम या दशम में स्थित हों तो पाँच प्रशस्त पुरुष उत्पन्न होते हैं। अतः उनको मैं कहता हूँ।
स्वगृह या उच्च में स्थित होकर केन्द्र में बली बृहस्पति हो तो हंस, शनि हो तो शत, मंगल हो तो रुचक, बुध हो तो भद्र और शुक्र हो तो मालव्य योग होता है।
सूर्य बली हो तो पुरुष परिपूर्ण सत्त्व वाला एवं चन्द्र बली हो तो मानसिक बल बाला होता है। सूर्य-चन्द्र दोनों जिस राशि के भेद (राशि, होरा, द्रेष्काण, नवांश, द्वादशांस और त्रिंशाश) में बैठे हों, उस राशिपति के धातु, महाभूत, प्रकृति, कान्ति, वर्ण, सत्व, रूप आदि लक्षणों से युत पुरुष होता है
बली सूर्य और चन्द्र जिस-जिस ग्रह के राशिभेद में बैठे हों, उन ग्रहों के धातु आदि लक्षणों से युत पुरुष होता है अथवा सूर्य-चन्द्र दोनों में से एक बली होकर जिस ग्रह के राशिभेद में स्थित हों, उस ग्रह के धातु आदि लक्षणों से युत पुरुष होता है थिया दोनों निर्बल होकर जिस-जिस ग्रह के राशिभेद में स्थित हों, उन दोनों के मिश्रित लक्षणों से युत पुरुष होता है।
मंगल से सत्त्व, बुध से गुरुता, बृहस्पति से स्वर, शुक्र से स्नेह और शनि से कान्ति होती है। यदि मंगल आदि ग्रह बली हों तो पुरुष सत्त्व आदि गुणों से युत और निर्बल हों तो सत्त्व आदि गुणों से रहित होता है।
सङ्कीर्ण लक्षण वाले मनुष्य राजा नहीं; किन्तु भौम आदि ग्रहों की दशा में सुखी होते हैं। शत्रुगृह, नीच, उच्च-इन स्थानों से चलित शुभ और पापग्रहों की दृष्टि से भेद होते हैं। उन भेदों से मनुष्य में सङ्कीर्णता दोष होता है।
९६ अंगुल ऊँचाई और ९६ अंगुल व्यायाम (दोनों पुजा फैलाकर कर चौड़ाई) हंस का होता है। इसमें तीन-तीन अंगुल बढ़ाने से क्रम से शश, रुचक, भद्र और मालव्य पुरुष की ऊँचाई और व्यायाम होता है।
सात्त्विक पुरुषों को दया, स्थिरता, प्राणियों में सरलता और देवता में भक्ति होती है। रजोगुण वाला मनुष्य काव्य, कला, यज्ञ और खो में आसक्त तथा अतिशूर होता है।
तमोगुण वाला मनुष्य दूसरे को ठगने वाला, मूर्ख, आलसी, क्रोधी और अधिक सोने बाला होता है। मिश्रित (सत्त्व-रज, सत्त्व-तम, रज-तम और सत्त्व-रज-तम) - इस तरह गुणों के प्रभेद से सात प्रकार के मनुष्य होते हैं।
मालव्य पुरुष हाथों के चुमान नासिका वाला, तुल्य भुजा वाला, जानु तक लम्बे हाथ वाला, पुष्ट अंगसन्धि वाला, समान सुन्दर शरीर वाला, कुश मध्य भाग वाला, ठोड़ी से शिर तक की तेरह अंगुल ऊँचाई वाला,
ठोड़ी से कान के छिद्र तक तिरछी दश अंगुल ऊँचाई वाला, दीप्त मुख और नेत्र वाला, सुन्दर कपोल वाला, समान और सफेद दाँत वाला तथा पतले अघर वाला होता है।
मालव्य पुरुष मालव, मरु, कच्छ, सुराष्ट्र (सूरत), लाट, सिन्धु देश और पारियात्र पर्वतवासियों की रक्षा करने वाला, अपने पराक्रम से धन कमाने वाला तथा सुन्दर बुद्धि वाला राजा होता है।
मालव्य पुरुष की आयु सत्तर वर्ष की होती है और वह तीर्थस्थान पर प्राण छोड़ता है। इस तरह मालब्य पुरुष के अच्छी तरह लक्षण कहकर शेष भद्र आदि पुरुषों का लक्षण कहता हूँ।
भद्र पुरुष पुष्ट, बराबर, गोल और लम्बे बाहु वाला, भुजाओं को फैलाने से जितनी चौड़ाई हो, उतनी ऊँचाई वाला तथा कोमल, सूक्ष्म और घने रोमों से युत कपोल वाला होता है।
सुन्दर त्वचा से युत, बहुत गाढ़े वीर्य वाला, विस्तीर्ण और पुष्ट छाती वाला, अधिक सत्त्व गुण वाला, बाप के समान मुख वाला, स्थिर स्वभाव वाला, शान्तिशील, धर्मात्मा, कृतज्ञ, हाथी के समान गति वाला, बहुत शाखों का ज्ञाता,
मुन्दर तताट और शंख वाला, कलाओं को जानने वाला, धीर, सुन्दर पेट बाला, कमलगर्भ से समान हाथ और पाँव वाला, योगी, सुन्दर नासिका वाला तथा समान और मिले हुये भुजाओं से युत भद्र पुरुष होता है ।
भद्र पुरुष के शरीर में नवीन जल से सिंची हुई भूमि की गन्ध के समान, गन्धपत्र, कुङ्कुम, हाथी का मद या अगर के समान गन्ध होती है। उसके शिर के एक-एक रोमकूप में काले और एक-एक बाल होते हैं तथा घोड़ा या हाथी के समान छिपा हुआ उसका लिंग होता है।
भद्र पुरुष के हाथ में हल, मूसल, गदा, खड्ग, शंख, चक्र, हाथी, मकर, कमल और रथ के समान रेखा होती है। इसकी सम्पत्ति को अन्य मनुष्य भी खूब भोगते हैं तथा यह बन्धुओं के लिये क्षमारहित और स्वतन्त्र बुद्धि वाला होता है।
भद्र पुरुष चौरासी अंगुल ऊँचा, एक तुला भार वाला और मध्य देश का राजा होता है। यदि इसकी एक सौ पाँच अंगुल व्यायाम हो तो चक्रवर्ती राजा होता है।
भद्र पुरुष अपने पराक्रम से उपार्जित पृथ्वी को अच्छी तरह भोग कर अस्सी वर्ष की अवस्था में तीर्थस्थान पर प्राण छोड़ कर स्वर्ग जाता है।
कुछ ऊँचे दाँत वाला, छोटे दाँत और नख वाला, पुष्ट नेत्रकोश वाला, शीघ्रगामी, विद्या और धातुओं के व्यापारक्रिया में आसक्त, पुष्ट कपोल वाला, शठ, सेनापति, मैयुनप्रिय, परती में आसक्त, शूर, माता का भक्त तथा वन, पर्वत, नदी और दुगों में आसक्त शश पुरुष होता है।
शश पुरुष बानबे अंगुल ऊँचा, सब कार्यों में शङ्कायुत, परछिद्रान्वेषी, मज्जासार, स्थिर गति और अधिक स्थूलता से रहित होता है।
शश पुरुष का मध्य भाग दुर्बल होता है तथा उसके पाँव या हाथ में ढाल, खड्ग, वीणा, पलंग, माला, मृदंग और त्रिशूल के समान रेखा या ऊर्ध्व रेखा होती है।
शत पुरुष म्लेच्छ देश का माण्डलिक या राजा होता है तथा कुल्हे के टूटने आदि के कारण होने वाली पीड़ा से पीडित शरीर वाला होता है। इस तरह सत्तर वर्ष की आयु में वह यम के आलय में पृप्ता है अर्थात् मृत्यु को प्राप्त कराता है।
लाल मुख वाला, पुष्ट कपोल वाला, ऊँची नासिका वाला, सुवर्ण के समान कान्ति वाला, गोल शिर वाला, शहद के समान आँख वाला, रक्त नखों से युत, माला, अंकुश, शंख, मत्स्ययुगल, यज्ञाङ्ग (बेदी-सुव आदि), कलश या कमल के समान रेखा से युत हाथ-पाँव वाला, हंस के समान मधुर स्वर वाला, सुन्दर पाँव वाला और निर्मल इन्द्रिय वाला हंस पुरुष होता है।
हंस पुरुष को जल में स्नेह और शुक्रसार होता है तथा इसकी ऊँचाई छियानबे अंगुल होती है।
नेपाल, शूरसेन, गान्धार, गंगा और यमुना के मध्य का देश इन देशों का हंस पुरुष भोग करता है तथा नब्बे वर्ष तक राज्य का भोग करके वन के समीप में ही मृत्यु को प्राप्त होता है।
रुचक पुरुष सुन्दर धू और केशों से युत, लालिमा लिये हुय श्याम वर्ण वाला, शंख के समान कण्ठ वाला, लम्बा मुख वाला, शूर, क्रूर, श्रेष्ठ, मन्त्री, चोरों का स्वाभो और व्यायामी (परिश्रमी ) होता है।
रुचक पुरुष के मुख की लम्बाई के तुल्य उदर के मध्य भाग की चौड़ाई होती है। साथ ही यह थोड़ी कान्ति वाला, शोणित और मांस में सार वाला, शत्रु का नाश करने वाला और अपने साहस से कार्य को सिद्ध करने वाला होता है।
रुचक पुरुष के हाथ या पाँव में खट्‌वाङ्ग, वीणा, बैल, धनुष, वज्ञ, बहीं, चन्द्र या त्रिशूल के समान चिह्न होते हैं। यह गुरु, ब्राह्मण और देवताओं का भक्त, सौ अंगुल ऊँचा और एक हजार पल शारीरिक भार वाला होता है।
रुचक पुरुष मन्त्र और अभिचार (मारण, मोहन, वशीकरण, उच्चाटन और विद्वेषण) में कुशल तथा कुशं जानु और जंघा वाला होता है। यह विन्ध्याचल, सह्याचल और उज्जयिनी में राज्य का भोग कर सत्तर वर्ष की आयु में शस्त्र या अग्नि से मृत्यु को प्राप्त करता है।
पूर्वोक्त पाँच महापुरुषों के अतिरिक्त उनके अनुचररूप संकीर्ण संज्ञक वामनक, जघन्य, कुब्ज, मण्डलक, माची- ये पाँच पुरुष होते हैं। अब इनके लक्षणों को कहता हूँ, उसका श्रवण करो।
वामनक पुरुष सम्पूर्ण अवयवों में युत, टूटी हुई पीठ याला, अविकसित करु, मध्य भाग और कक्ष्यान्तर वाला, प्रसिद्ध राजाओं के बीच में भद्र राजा का अनुजीवी, धनो, स्फोत, राजा तथा विष्णु का भक्त होता है।
जघन्य पुरुष मालव्य राजा का सेवक, अर्थबन्द्र के समान कान वाला, सुन्दर अङ्गसन्धि वाला, शुक्रसार, पिशुन (सूचक), पण्डित, रूखी शरीरकान्ति वाला और मोटी हस्ताङ्गुलि याला होता है।
यह कूर, पनी, स्थूल बुद्धि, प्रसिद्ध, ताम्र वर्ष की तरह कान्ति बाला एवं हास्यप्रिय होता है तथा इसकी छाती, चरण और हाथ तलवार, बड़ीं, पाश और परशु के समान रेखाओं से युत होते हैं।
कुब्ज पुरुष नाभि से नीचे पूर्ण अंग और ऊपर कुछ क्षीण और नत अंग वाला, हंस नामक राजा का सेवक, नास्तिक, धनी, विद्वान्, क्रूर, सूचक और कृतज्ञ होता है।
यह कुब्ज पुरुष कलाओं का ज्ञाता, कलहप्रिय, बहुत भृत्यों से युत, तोजित, लोगों का आदर करके अकस्मात् छोड़ने वाला और सदा उरई में होता है।
मण्डलक नामक पुरुष रुचर्क राजा का सेवक, अभिचार (मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण और विद्वेषण) का ज्ञाता, समर्थ, कृत्या (अभिचार मन्त्र के द्वारा शत्रुवध के लिये अग्निमध्य से जो स्त्री उत्पन्न होती है, उसको कृत्या कहते हैं)
वेताल (मरे हुये को मन्त्र द्वारा उठाने को वेताल कहते हैं) आदि विद्याओं में सक्त, वृद्ध के समान शरीर वाला, कठोर और रूखे केश वाला, शत्रु को मारने में कुशल, ब्राह्मण, देवता, यज्ञ और योग में आसक्त बुद्धि वाला, खोजित एवं बुद्धिमान् होता है।
साचि पुरुष अति कुरूप, शश नामक राजा का सेवक, लोगों का अप्रिय, दानी, बड़े-बड़े कार्यों को प्रारम्भ करके समाप्त करने वाला और अपने गुणों से शश के समान ही होता है।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
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