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बृहत्संहिता • अध्याय 69 • श्लोक 37
कलास्वभिज्ञः कलहप्रियश्च प्रभूतभृत्यः प्रमदाजितश्च । सततोद्यतश्च ॥
यह कुब्ज पुरुष कलाओं का ज्ञाता, कलहप्रिय, बहुत भृत्यों से युत, तोजित, लोगों का आदर करके अकस्मात् छोड़ने वाला और सदा उरई में होता है।
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