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बृहत्संहिता • अध्याय 69 • श्लोक 38
मण्डलकलक्षणमतो रुचकानुचरोऽभिचारवित् कुशलः । कृत्यावेतालादिषु कर्मसु विद्यासु वृद्धाकारः खरपरुषमूर्धजश्च शत्रुनाशने द्विजदेवयज्ञयोगप्रसक्तधीः स्त्रीजितो चानुरतः ॥
मण्डलक नामक पुरुष रुचर्क राजा का सेवक, अभिचार (मारण, मोहन, उच्चाटन, वशीकरण और विद्वेषण) का ज्ञाता, समर्थ, कृत्या (अभिचार मन्त्र के द्वारा शत्रुवध के लिये अग्निमध्य से जो स्त्री उत्पन्न होती है, उसको कृत्या कहते हैं)
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