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बृहत्संहिता • अध्याय 69 • श्लोक 1
ताराप्रहैर्बलयुतैः स्वक्षेत्रस्वोच्चगै चतुष्टयगैः । पञ्च पुरुषाः प्रशस्ता जायन्ते तानहं वक्ष्ये ॥
स्थान, दिक्, चेष्टा और कालबल से युक्त मंगल आदि पाँच ग्रह अपने गृह या उच्च में स्थित होकर लग्न, चतुर्थ, सप्तम या दशम में स्थित हों तो पाँच प्रशस्त पुरुष उत्पन्न होते हैं। अतः उनको मैं कहता हूँ।
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