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अध्याय 1 — आजगरगीता
आजगरगीता
37 श्लोक • केवल अनुवाद
राजा युधिष्ठिर ने पूछा - पितामह! आप सदाचार के स्वरूप को जानने वाले हैं। कृपया यह बताइये, किस तरह के आचार को अपनाकर मनुष्य शोकरहित हो इस पृथ्वी पर विचरण कर सकता है? और इस जगत्में कौन-सा कर्म करके वह उत्तम गति पा सकता है?
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! इस विषय में भी प्रह्लाद तथा अजगरवृत्ति से रहने वाले एक मुनि के संवादरूप प्राचीन इतिहास का दृष्टान्त दिया जाता है।
एक सुदृढ़चित्त, दुःख-शोक से रहित तथा बुद्धिसम्मत ब्राह्मण को पृथ्वी पर विचरते देख बुद्धिमान् राजा प्रह्लाद ने उससे इस प्रकार पूछा:-
प्रह्लाद बोले - ब्रह्मन्! आप स्वस्थ, शक्तिमान्, मृदु, जितेन्द्रिय, कर्मारम्भ से दूर रहने वाले, दूसरों के दोषों पर दृष्टि न डालने वाले, सुन्दर और मधुर वचन बोलने वाले, निर्भीक, प्रतिभाशाली, मेधावी तथा तत्त्वज्ञ होकर भी बालकों के समान विचर रहे हैं।
न आप कोई लाभ चाहते हैं और न हानि होने पर उसके लिये ही शोक करते हैं। ब्रह्मन्! आप नित्यतृप्त से रहते हुए न किसी वस्तु को प्रिय मानते हैं और न अप्रिय।
सारी प्रजा काम-क्रोध आदि के प्रवाह में पड़कर बही जा रही है; परंतु आप उधर से उदासीन-जैसे जान पड़ते हैं तथा धर्म, अर्थ एवं काम-सम्बन्धी कार्यों के प्रति भी निश्चेष्ट से दिखायी देते हैं।
धर्म और अर्थ-सम्बन्धी कार्यों का आप अनुष्ठान नहीं करते हैं, काम में भी आपकी प्रवृत्ति नहीं है। आप इन्द्रियों के सम्पूर्ण विषयों की उपेक्षा करके साक्षी के समान मुक्तरूप से विचरते हैं।
मुने! आपके पास कौन-सी ऐसी बुद्धि, कैसा शास्त्रज्ञान अथवा कौन-सी वृत्ति है, जिससे आपका जीवन ऐसा बन गया है? ब्रह्मन्! आपके मत से इस जगत्में मेरे लिये जो श्रेय का साधन हो, उसे शीघ्र बतायें।
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! प्रह्लाद के इस प्रकार पूछने पर लोक-धर्म के विधान को जानने वाले उन मेधावी मुनि ने उनसे मधुर एवं सार्थक वाणी में इस प्रकार कहा:-
प्रह्लाद! देखो, इस जगत्के प्राणियों की उत्पत्ति, वृद्धि, ह्रास और विनाश कारणरहित सत्स्वरूप परमात्मा से ही हुए हैं; इस कारण मैं उनके लिये न तो हर्ष प्रकट करता हूँ और न व्यथित ही होता हूँ।
ऐसा समझना चाहिये, पूर्वकृत कर्मानुसार बने हुए स्वभाव से ही प्राणियों की वर्तमान प्रवृत्तियाँ प्रकट हुई हैं; अतः समस्त प्रजा स्वभाव में ही तत्पर है, उनका दूसरा कोई आश्रय नहीं है। इस रहस्य को समझकर मनुष्य को किसी भी परिस्थिति में सन्तुष्ट नहीं होना चाहिये।
प्रह्लाद! देखो, जितने संयोग हैं, उनका पर्यवसान वियोग में ही होता है और जितने संचय हैं, उनकी समाप्ति विनाश में ही होती है। यह सब देखकर मैं कहीं भी अपने मन को नहीं लगाता हूँ।
जो गुणयुक्त सम्पूर्ण भूतों को नाशवान् देखता है तथा उत्पत्ति और प्रलय के तत्त्व को जानता है, उसके लिये यहाँ कौन-सा कार्य अवशिष्ट रह जाता है?
महासागर के जल में पैदा होने वाले विशाल शरीर वाले तिमि आदि मत्स्यों तथा छोटे-छोटे कीड़ों का भी मैं बारी-बारी से विनाश होता देखता हूँ।
असुरराज! पृथ्वी पर भी जितने स्थावर जंगम प्राणी हैं, उन सबकी मृत्यु मुझे स्पष्ट दिखायी दे रही है।
दानवश्रेष्ठ! आकाश में विचरने वाले बलवान् पक्षियों के समक्ष भी यथासमय मृत्यु आ पहुँचती है।
आकाश में जो छोटे-बड़े ज्योतिर्मय नक्षत्र विचर रहे हैं, उन्हें भी मैं यथासमय नीचे गिरते देखता हूँ।
इस प्रकार सारे प्राणियों को मैं मृत्यु के पाश में बद्ध देखता हूँ; इसलिये तत्त्व को जानकर कृतकृत्य हो सबके प्रति समान भाव रखता हुआ सुख से सोता हूँ।
यदि दैवेच्छा से अकस्मात् अधिक भोजन प्राप्त हो जाय तो मैं बहुत खा लेता हूँ, ग्रासमात्र मिले तो उसी में सन्तुष्ट रहता हूँ और न मिला तो बहुत दिनों तक बिना खाये पीये भी सो रहता हूँ।
फिर कितने ही लोग आकर मुझे अनेक गुणों से सम्पन्न बहुत-सा अन्न खिला देते हैं। पुनः कभी बहुत थोड़ा, कभी थोड़े से भी थोड़ा भोजन मिलता है और कभी वह भी नहीं मिलता।
कभी चावल की कनी खाता हूँ, कभी तिल की खली ही खाकर रह जाता हूँ और कभी अगहनी के चावल का भात भरपेट खाता हूँ। इस प्रकार मुझे बढ़िया-घटिया सभी तरह के भोजन बारम्बार प्राप्त होते रहते हैं।
कभी पलंग पर सोता हूँ, कभी पृथ्वी पर ही पड़ा रहता हूँ और कभी-कभी मुझे महल के भीतर बिछी हुई बहुमूल्य शय्या भी उपलब्ध हो जाती है।
मैं कभी तो चिथड़े अथवा वल्कल पहनकर रहता हूँ, कभी सन के, कभी रेशम के और कभी मृगचर्म के वस्त्र धारण करता हूँ तथा किसी एक काल में बहुत-से बहुमूल्य वस्त्रों को भी पहन लेता हूँ।
यदि दैववश मुझे कोई धर्मानुकूल भोग्य पदार्थ प्राप्त हो जाय तो मैं उससे द्वेष नहीं करता हूँ और प्राप्त न होने पर किसी दुर्लभ भोग की भी कभी इच्छा नहीं करता।
मैं सदा पवित्र भाव से रहकर इस अजगर वृत्ति का अनुसरण करता हूँ। यह अत्यन्त सुदृढ़, मृत्यु से दूर रखने वाली, कल्याणमय, शोकहीन, शुद्ध, अनुपम और विद्वानों के मत के अनुकूल है। मूर्ख मनुष्य न तो इसे मानते हैं और न इसका सेवन ही करते हैं।
मेरी बुद्धि अविचल है, मैं अपने धर्म से च्युत नहीं हुआ हूँ, मेरा सांसारिक व्यवहार परिमित हो गया है, मुझे उत्तम और अधम का ज्ञान है, मेरे हृदय से भय, राग-द्वेष, लोभ और मोह दूर हो गये हैं तथा पवित्र भाव से रहकर इस अजगरोचित व्रत का आचरण करता हूँ।
यह अजगर-सम्बन्धी व्रत मेरे हृदय को सुख देने वाला है। इसमें भक्ष्य, भोज्य, पेय और फल आदि के मिलने की कोई नियत व्यवस्था नहीं रहती। अनियतरूप से जो कुछ मिल जाय, उसी से निर्वाह करना होता है। इस व्रत में प्रारब्ध के परिणाम के अनुसार देश और काल का विभाग नियत है। विषयलोलुप नीच पुरुष इसका सेवन नहीं करते, मैं पवित्र भाव से इसी व्रत का आचरण करता हूँ।
जो यह मिले, वह मिले - इस प्रकार तृष्णा से दबे रहते हैं और धन न मिलने के कारण निरन्तर विषाद करते हैं; ऐसे लोगों की दशा अच्छी तरह देखकर तात्त्विक बुद्धि से सम्पन्न हुआ मैं पवित्र भाव से इस आजगर व्रत का आचरण करता हूँ।
मैं बारम्बार देखता हूँ कि श्रेष्ठ मनुष्य भी धन के लिये दीनभाव से नीच पुरुष का आश्रय लेते हैं। यह देखकर मेरी रुचि प्रशान्त हो गयी है। अतः मैं अपने स्वरूप को प्राप्त और सर्वथा शान्त हो गया हूँ और पवित्र भाव से इस आजगर व्रत का आचरण करता हूँ।
सुख-दुःख, लाभ-हानि, अनुकूल और प्रतिकूल तथा जीवन और मरण - ये सब दैव के अधीन हैं। इस प्रकार यथार्थरूप से जानकर मैं शुद्ध भाव से इस आजगर व्रत का आचरण करता हूँ।
मेरे भय, राग, मोह और अभिमान नष्ट हो गये हैं। मैं धृति, मति और बुद्धि से सम्पन्न एवं पूर्णतया शान्त हूँ और प्रारब्धवश स्वतः अपने समीप आयी हुई वस्तु का ही उपभोग करने वालों को देखकर मैं पवित्र भाव से इस आजगर व्रत का आचरण करता हूँ।
मेरे सोने-बैठने का कोई नियत स्थान नहीं है। मैं स्वभावतः दम, नियम, व्रत, सत्य और शौचाचार से सम्पन्न हूँ। मेरे कर्मफल-संचय का नाश हो चुका है। मैं प्रसन्नतापूर्वक पवित्र भाव से इस आजगर व्रत का आचरण करता हूँ।
जिनका परिणाम दुःख है, उन इच्छा के विषयभूत समस्त पदार्थों से जो विरक्त हो चुका है, ऐसे आत्मनिष्ठ महापुरुष को देखकर मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है। अतः मैं तृष्णा से व्याकुल असंयत मन को वश में करने के लिये पवित्र भाव से इस आजगर व्रत का आचरण करता हूँ।
मन, वाणी और बुद्धि की उपेक्षा करके इनको प्रिय लगने वाले विषय-सुखों की दुर्लभता तथा अनित्यता - इन दोनों को देखने वाले की भाँति मैं पवित्र भाव से इस आजगर व्रत का आचरण करता हूँ।
अपनी कीर्ति का विस्तार करने वाले विद्वानों और बुद्धिमानों ने अपने और दूसरों के मत से गहन तर्क और वितर्क करके "ऐसे करना चाहिये" 'ऐसे करना चाहिये' इत्यादि कहकर इस व्रत की अनेक प्रकार से व्याख्या की है।
मूर्ख लोग इस आजगर वृत्ति को सुनकर इसे पहाड़ की चोटी से गिरने की भाँति भयंकर समझते हैं। परंतु उनकी वह मान्यता भिन्न है। मैं इस अजगर वृत्ति को अज्ञान का नाशक और समस्त दोषों से रहित मानता हूँ। अतः दोष और तृष्णा का त्याग करके मनुष्यों में विचरता हूँ।
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! जो महापुरुष राग, भय, लोभ, मोह और क्रोध को त्यागकर इस आजगर व्रत का पालन करता है, वह इस लोक में सानन्द विचरण करता है।
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धर्म का अन्वेषण
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