कणं कदाचित् खादामि पिण्याकमपि च ग्रसे।
भक्षये शालिमांसानि भक्षांश्चोच्चावचान् पुनः ॥
कभी चावल की कनी खाता हूँ, कभी तिल की खली ही खाकर रह जाता हूँ और कभी अगहनी के चावल का भात भरपेट खाता हूँ। इस प्रकार मुझे बढ़िया-घटिया सभी तरह के भोजन बारम्बार प्राप्त होते रहते हैं।
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