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आजगरगीता • अध्याय 1 • श्लोक 11
स्वभावादेव, संदृश्या वर्तमानाः प्रवृत्तयः । स्वभावनिरताः सर्वाः परितुष्येन्न केनचित् ॥
ऐसा समझना चाहिये, पूर्वकृत कर्मानुसार बने हुए स्वभाव से ही प्राणियों की वर्तमान प्रवृत्तियाँ प्रकट हुई हैं; अतः समस्त प्रजा स्वभाव में ही तत्पर है, उनका दूसरा कोई आश्रय नहीं है। इस रहस्य को समझकर मनुष्य को किसी भी परिस्थिति में सन्तुष्ट नहीं होना चाहिये।
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