अन्तवन्ति च भूतानि गुणयुक्तानि पश्यतः ।
उत्पत्तिनिधनज्ञस्य किं कार्यमवशिष्यते ॥
जो गुणयुक्त सम्पूर्ण भूतों को नाशवान् देखता है तथा उत्पत्ति और प्रलय के तत्त्व को जानता है, उसके लिये यहाँ कौन-सा कार्य अवशिष्ट रह जाता है?
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