शये कदाचित् पर्यङ्के भूमावपि पुनः शये।
प्रासादे चापि मे शय्या कदाचिदुपपद्यते ॥
कभी पलंग पर सोता हूँ, कभी पृथ्वी पर ही पड़ा रहता हूँ और कभी-कभी मुझे महल के भीतर बिछी हुई बहुमूल्य शय्या भी उपलब्ध हो जाती है।
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