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आजगरगीता • अध्याय 1 • श्लोक 35
कविभिरपि बहुकथितमिदं हि बुद्धिमद्भिः प्रथयद्भिरात्मकीर्तिम् । इदमिदमिति तत्र तत्र हन्त स्वपरमतैर्गहनं प्रतर्कयद्भिः ॥
अपनी कीर्ति का विस्तार करने वाले विद्वानों और बुद्धिमानों ने अपने और दूसरों के मत से गहन तर्क और वितर्क करके "ऐसे करना चाहिये" 'ऐसे करना चाहिये' इत्यादि कहकर इस व्रत की अनेक प्रकार से व्याख्या की है।
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