अपनी कीर्ति का विस्तार करने वाले विद्वानों और बुद्धिमानों ने अपने और दूसरों के मत से गहन तर्क और वितर्क करके "ऐसे करना चाहिये" 'ऐसे करना चाहिये' इत्यादि कहकर इस व्रत की अनेक प्रकार से व्याख्या की है।
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