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आजगरगीता • अध्याय 1 • श्लोक 37
भीष्म उवाच अजगरचरितं व्रतं महात्मा य इह नरोऽनुचरेद् विनीतरागः । अपगतभयलोभमोहमन्युः स खलु सुखी विचरेदिमं विहारम् ॥ ॥ इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि आजगरगीता सम्पूर्णा ॥
भीष्मजी कहते हैं - राजन्! जो महापुरुष राग, भय, लोभ, मोह और क्रोध को त्यागकर इस आजगर व्रत का पालन करता है, वह इस लोक में सानन्द विचरण करता है।
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