फिर कितने ही लोग आकर मुझे अनेक गुणों से सम्पन्न बहुत-सा अन्न खिला देते हैं। पुनः कभी बहुत थोड़ा, कभी थोड़े से भी थोड़ा भोजन मिलता है और कभी वह भी नहीं मिलता।
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