न आप कोई लाभ चाहते हैं और न हानि होने पर उसके लिये ही शोक करते हैं। ब्रह्मन्! आप नित्यतृप्त से रहते हुए न किसी वस्तु को प्रिय मानते हैं और न अप्रिय।
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