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आजगरगीता • अध्याय 1 • श्लोक 33
अपगतमसुखार्थमीहनार्थे-रुपगतबुद्धिरवेक्ष्य चात्मसंस्थम् । तृषितमनियतं मनो नियन्तुं व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥
जिनका परिणाम दुःख है, उन इच्छा के विषयभूत समस्त पदार्थों से जो विरक्त हो चुका है, ऐसे आत्मनिष्ठ महापुरुष को देखकर मुझे ज्ञान प्राप्त हो गया है। अतः मैं तृष्णा से व्याकुल असंयत मन को वश में करने के लिये पवित्र भाव से इस आजगर व्रत का आचरण करता हूँ।
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