नानुतिष्ठसि धर्मार्थों न कामे चापि वर्तसे ।
इन्द्रियार्थाननादृत्य मुक्तश्चरसि साक्षिवत् ॥
धर्म और अर्थ-सम्बन्धी कार्यों का आप अनुष्ठान नहीं करते हैं, काम में भी आपकी प्रवृत्ति नहीं है। आप इन्द्रियों के सम्पूर्ण विषयों की उपेक्षा करके साक्षी के समान मुक्तरूप से विचरते हैं।
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