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आजगरगीता • अध्याय 1 • श्लोक 29
बहुविधमनुदृश्य चार्थहेतोः कृपणमिहार्यमनार्यमाश्रयन्तम् । उपशमरुचिरात्मवान् प्रशान्तो व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥
मैं बारम्बार देखता हूँ कि श्रेष्ठ मनुष्य भी धन के लिये दीनभाव से नीच पुरुष का आश्रय लेते हैं। यह देखकर मेरी रुचि प्रशान्त हो गयी है। अतः मैं अपने स्वरूप को प्राप्त और सर्वथा शान्त हो गया हूँ और पवित्र भाव से इस आजगर व्रत का आचरण करता हूँ।
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