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आजगरगीता • अध्याय 1 • श्लोक 6
स्त्रोतसा ह्रियमाणासु प्रजासु विमना इव। धर्मकामार्थकार्येषु कूटस्थ इव लक्ष्यसे ॥
सारी प्रजा काम-क्रोध आदि के प्रवाह में पड़कर बही जा रही है; परंतु आप उधर से उदासीन-जैसे जान पड़ते हैं तथा धर्म, अर्थ एवं काम-सम्बन्धी कार्यों के प्रति भी निश्चेष्ट से दिखायी देते हैं।
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