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आजगरगीता • अध्याय 1 • श्लोक 24
न संनिपतितं धर्म्यमुपभोगं यदृच्छया । प्रत्याचक्षे न चाप्येनमनुरुध्ये सुदुर्लभम् ॥
यदि दैववश मुझे कोई धर्मानुकूल भोग्य पदार्थ प्राप्त हो जाय तो मैं उससे द्वेष नहीं करता हूँ और प्राप्त न होने पर किसी दुर्लभ भोग की भी कभी इच्छा नहीं करता।
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