न हृदयमनुरुध्य वामनो वा प्रियसुखदुर्लभतामनित्यतां च।
तदुभयमुपलक्षयन्निवाहं व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥
मन, वाणी और बुद्धि की उपेक्षा करके इनको प्रिय लगने वाले विषय-सुखों की दुर्लभता तथा अनित्यता - इन दोनों को देखने वाले की भाँति मैं पवित्र भाव से इस आजगर व्रत का आचरण करता हूँ।
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