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आजगरगीता • अध्याय 1 • श्लोक 26
अचलितमतिरच्युतः स्वधर्मात् परिमितसंसरणः परावरज्ञः । विगतभयकषायलोभमोहो व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥
मेरी बुद्धि अविचल है, मैं अपने धर्म से च्युत नहीं हुआ हूँ, मेरा सांसारिक व्यवहार परिमित हो गया है, मुझे उत्तम और अधम का ज्ञान है, मेरे हृदय से भय, राग-द्वेष, लोभ और मोह दूर हो गये हैं तथा पवित्र भाव से रहकर इस अजगरोचित व्रत का आचरण करता हूँ।
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