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आजगरगीता • अध्याय 1 • श्लोक 36
तदिदमनुनिशम्य विप्रपातं पृथगभिपन्नमिहाबुधैर्मनुष्यैः अनवसितमनन्तदोषपारं नृषु विहरामि विनीतदोषतृष्णः ॥
मूर्ख लोग इस आजगर वृत्ति को सुनकर इसे पहाड़ की चोटी से गिरने की भाँति भयंकर समझते हैं। परंतु उनकी वह मान्यता भिन्न है। मैं इस अजगर वृत्ति को अज्ञान का नाशक और समस्त दोषों से रहित मानता हूँ। अतः दोष और तृष्णा का त्याग करके मनुष्यों में विचरता हूँ।
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