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आजगरगीता • अध्याय 1 • श्लोक 32
अनियतशयनासनः प्रकृत्या दमनियमव्रतसत्यशौचयुक्तः । अपगतफलसञ्चयः प्रहृष्टो व्रतमिदमाजगरं शुचिश्चरामि ॥
मेरे सोने-बैठने का कोई नियत स्थान नहीं है। मैं स्वभावतः दम, नियम, व्रत, सत्य और शौचाचार से सम्पन्न हूँ। मेरे कर्मफल-संचय का नाश हो चुका है। मैं प्रसन्नतापूर्वक पवित्र भाव से इस आजगर व्रत का आचरण करता हूँ।
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