प्रह्लाद! देखो, जितने संयोग हैं, उनका पर्यवसान वियोग में ही होता है और जितने संचय हैं, उनकी समाप्ति विनाश में ही होती है। यह सब देखकर मैं कहीं भी अपने मन को नहीं लगाता हूँ।
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