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आजगरगीता • अध्याय 1 • श्लोक 12
पश्य प्रह्लाद संयोगान् विप्रयोगपरायणान् । सञ्चयांश्च विनाशान्तान् न क्वचिद् विदधे मनः ॥
प्रह्लाद! देखो, जितने संयोग हैं, उनका पर्यवसान वियोग में ही होता है और जितने संचय हैं, उनकी समाप्ति विनाश में ही होती है। यह सब देखकर मैं कहीं भी अपने मन को नहीं लगाता हूँ।
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