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अध्याय 5 — पंचम अंक

अभिज्ञानशाकुन्तलम्
31 श्लोक • केवल अनुवाद
(तत्पश्चात्‌ आसन पर बैठे हुए राजा और विदूषक प्रवेश करते हैं) विदूषक:-- (कान लगाकर) हे मित्र ! संगीतशाला के भीतर ध्यान दीजिये । अस्पष्ट-मधुर ध्वनियुक्त शुद्धा नामक गीति का स्वर आलाप (सुरीला तान) सुनायी पड़ रहा है । मैं समझता हूँ कि माननीया (रानी) हंसपदिका वर्णों का परिचय (गीति क्रम का परिचय प्राप्त) कर रही हैं । राजा:-- चुप (शान्त) हो जाओ । जब तक मैं सुनता हूँ । (आकाश में गाया जाता है) हे भ्रमर ! नवीन मधु (अनास्वादित पुष्परस) के लोभी तुम आम की मञ्जरी को उस प्रकार (अत्यधिक प्रेम से) चुम्बन (रसास्वादन) कर (अब) कमल में निवासमात्र से सन्तुष्ट (होकर) इस (आम्रमञ्चरी) को कैसे भूल गये हो ?
राजा:-- अहा, (क्या ही) अनुराग की वर्षा करने वाली गीति है । विदूषक:-- क्या (आप ने) गीत के शब्दों का अर्थ समझ लिया ? राजा:-- (मुस्कराकर) यह व्यक्ति (हंसपदिका) (मेरे द्वारा) एक बार प्रेम किया गया था (अर्थात्‌ इस हंसपदिका से मेने एक बार प्रेम किया था) । देवी वसुमती को लक्ष्य मे रखकर इस (हंसपदिका) ने मुझे बहुत बड़ा उलाहना दिया है । मित्र माधव्य, मेरी ओर से हंसपदिका से कहना कि तुमने मुझे अत्यन्त चतुरता से उलाहना दिया है । विदूषक:-- आपकी जो आज्ञा (आपकी आज्ञा के अनुसार कार्य करुंगा) । (उठकर) हे मित्र, अब उस (हंसपदिका) के द्वारा दूसरी (सेविकाओं) के हाथों से शिखा (चोटी) पकड़ कर मारे जाते हुये मुझको, छुटकारा उसी प्रकार नहीं मिलेगा जिस प्रकार अप्सरा के द्वारा (पकड़े गये) (किसी) विरक्त (संन्यासी) को मुक्ति नहीं मिलती । राजा:-- जाओ । शिष्ट व्यवहार (नागरिक-वृत्ति) से उसको समझा देना । विदूषक:-- क्या उपाय है ? (अर्थात्‌ इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपय नहीं है) । (निकल जाता है) । राजा:-- (अपने मन में) किस कारण से इस प्रकार के भाव (अर्थ) पूर्ण गीत को सुनकर प्रिय व्यक्ति के वियोग के बिना भी अत्यधिक उत्कण्ठित (खिन्न) हो रहा हूँ ? अथवा रमणीय (वस्तुओं) को देखकर और मधुर शब्दों को सुनकर सुखी (प्रसन्नचित्त) प्राणी भी जो उत्कण्ठित (खिन्न) हो जाता है; वह निश्चय ही संस्कार (वासना) के रूप में (हृदय से) विद्यमान पूर्वजन्मों के प्रणय-सम्बन्धों (प्रम व्यवहारो) को अज्ञानपूर्वक मन से स्मरण करता है । ( खित्रावस्था में बेठता है )
( तत्पश्चात्‌ कञ्चुकी प्रवेश करता है ) कञ्चुकी:-- ओह, मैं, (अब) ऐसी अवस्था को प्राप्त हो गया (पहुंच गया) हूँ । राजा के अन्तःपुर में (यह) नियम (परम्परा) है, में (मानकर) शक्तिसम्पन्न (समर्थ) (भी) मेरे द्वारा जो बेंत की छड़ी ग्रहण (धारण) की गयी थी, वही (बेंत की छड़ी) अधिक समय के बीत जाने पर (इस वृद्धावस्था से) चलने मे लड़खड़ाई हुई गति वाले (अर्थात्‌ चलने में असमर्थ) मेरे लिये सहारा की वस्तु हो (बन) गयी है ।
अरे, यद्यपि महाराज के लिये धर्मकार्य अतुलनीय हैं तथापि अभी ही न्यायासन (धर्मासन) से उठकर (गये हुए) इस (महाराज) से फिर (विश्राम में) विघ्न करने (बाधा डालने) वाले कण्व के शिष्यों के आगमन (के समाचार) को कहने में समर्थ नहीं हूँ । अथवा यह लोकतंत्र का अधिकार (प्रजा की रक्षा का अधिकार) विश्राम-रहित होता है (अर्थात्‌ प्रजा की रक्षा में लगे हुए राजा को विश्राम का अवसर कहाँ मिल सकता है) क्योकि सूर्य ने एक बार ही (अपने रथ में) घोड़ों को जोता है । वायु रात-दिन चलती (बहती) रहती है । शेषनाग सर्वदा ही पृथ्वी के भार को धारण किये रहते हैं । (प्रजा से कर के रूप में आय को) छठा भाग लेने वाले (अर्थात्‌ राजा) का भी यही कर्तव्य (धर्म) है ।
तो मैं (अपने) कर्तव्य का पालन करता हूँ । (चारों ओर घुूमकर ओर देखकर) यह महाराज अपनी सन्तान की भाँति प्रजाओं का पालन कर खिन्न (थके हुये) मन वाले (महाराज), उसी प्रकार एकान्त का सेवन कर रहे हैं, जिस प्रकार दिन हैं (अपने) झुण्डों को सञ्चालित कर (अपनी देख-रेख में) सूर्य (की किरणों) से सन्तप्त गजराज शीतल (छायादार) स्थान पर सेवन करता है ।
(समीप जाकर) जय हो, महाराज की जय हो । ये हिमालय की तराई के जङ्गल में रहने वाले तपस्वी लोग स्त्रियो के साथ (महर्षि) कण्व का सन्देश लेकर आये हैं । सुनकर महाराज ही (निर्णय के विषय में) प्रमाण हैं (अर्थात्‌ आप जेसी आज्ञा दे वैसा किया जाय) । राजा:-- (आदर के साथ) क्या कण्व के सन्देश को लेकर आये हैं ? कञ्चुकी:-- जी हां। राजा:-- तो मेरी आज्ञा से आचार्य सोमरात सूचित किये जायें (अर्थात्‌ आचार्य सोमरात से कहो) कि इन आश्रमवासियों का वेदिक विधि से सत्कार कर स्वयं ही (उन्हे) अन्दर ले आएं । मैं भी यहाँ तपस्वियों के दर्शन योग्य स्थान में स्थित हुआ (बैठा हुआ) प्रतीक्षा करता हूँ । कञ्चुकी:-- महाराज जो आज्ञा । (निकल जाता है) । राजा:-- (उठकर) वेत्रवती, यज्ञशाला (अग्निशरण) का मार्ग बताओ । प्रतिहारी:-- महाराज, इधर से, इधर से (आईये) । राजा:-- (चारो ओर घुमता है । अधिकार की खिन्नता का अभिनय कर) सभी प्राणी अपनी अभीष्ट वस्तु को प्राप्त कर सुखी होते हैं । किन्तु राजा को सफलता दुःखान्त (कष्टप्रद) ही होती है । उच्च-पद पर (राज्य-पद्‌ इत्यादि) की प्राप्ति केवल उत्सुकता (अभिलाषा) को समाप्त (पूर्ण) करती है, किन्तु प्राप्त (राज्यादि) की रक्षा का कार्य इस (प्राप्त-कर्ता) को कष्ट देता है । (अपने हाथ में ली गयी है दण्ड-व्यवस्था जिसकी ऐसा) राज्य, अपने हाथ में धारण किये हुये दण्ड वाले (अर्थात्‌ जिसका दण्ड अपने हाथ मे पकड़ लिया गया है, ऐसे) छाते की भाँति थकान को दूर करने के लिये (उतना) नहीं (होता), जितना थकान (उत्पन्न करने) के लिये (होता है) ।
(नेपथ्य में) दो चारण (स्तुतिपाठक):-- महाराज की जय हो, अपने सुख की अभिलाषा न करने वाले (आप) प्रजा (के हित) के लिये प्रतिदिन कष्ट उठाते हैं, अथवा आप का कार्य (ही) ऐसा है । क्योकि वृक्ष (अपने) सिर पर प्रचण्ड (तीक्ष्ण) धूप को सहन करता है (किन्तु) अपनी छाया से आश्रित लोगों के सन्ताप को शान्त (दूर) करता है ।
राजदण्ड को धारण किये हये तुम (आप) कुमार्ग पर जाने वाले लोगों को नियंत्रित करते हो (सन्मार्ग पर चलने के लिये बाध्य करते हो), (प्रजा के आपसी) विवादों (झगड़ों) को शान्त (समाप्त) करते हो और (प्रजा की) रक्षा में समर्थ हो । विशाल ऐश्वर्य के होने पर भले ही (बहुत से) सम्बन्धी (बन्धु-वान्धव) हो जाएँ, (किन्तु) प्रजा (लोगों) का बन्धु- बान्धवो के द्वारा सम्पन्न होने वाला कार्य (बन्धु-कार्य) तो आप में (ही) पूर्णं हाता है । (अर्थात्‌ प्रजा का बन्धु-कार्य आप ही पूरा करते हैं) ।
राजा:-- (इस स्तुति-पाठ को सुनकर) यह थके मन वाला मैं फिर नवीन (अर्थात्‌ ताजा) कर दिया गया हूँ । (घूमता है) । प्रतिहारी:-- अभी की गयी सफाई के कारण शोभायमान और हवन के (घृतादि के) लिये उपयोगी समीपस्थ गाय से युक्त यह यज्ञशाला का चबूतरा (आलिन्द्‌) है । महाराज (इस पर) चढ़ें । राजा:-- (चढ़कर सेविका के कन्धे का सहारा लेते हुये खड़ा होता है) वेत्रवती, किस उदेश्य से पूजनीय कण्व के द्वारा मेरे पास ऋषि भेजे गये होंगे ? क्या महान्‌ तपस्वी व्रती (ऋषियों) की तपस्या विघ्नो के द्वारा दूषित कर दी गयी है ? अथवा तपोवन में विचरण करने वाले प्राणियों (जीवों) पर किसी के द्वारा अनुचित व्यवहार (हिंसा आदि) किया गया है ? अथवा मेरे किन्हीं कुकृत्यो के कारण लताओं का प्रसव (उनमें पफूल-फल आना) रुक गया है ? इस प्रकार उत्पन्न अनेक शङ्काओं से ग्रस्त मेरा मन (कुछ भी) निर्णय (निश्चय) न कर सकने के कारण (व्याकुल हो रहा है) ।
प्रतिहारी:-- (आप के) सुन्दर चरित (आचरण) से प्रसन्न ऋषि लोग महाराज का अभिनन्दन करने के लिये आये हैं - ऐसा मैं सोच रही हूँ । (तत्पश्चात्‌ शकुन्तला को आगे करके गौतमी के साथ मुनि लोग प्रवेश करते हैं । इनके आगे-आगे कञ्चुकी और पुरोहित हैं) कञ्चुकी:-- इधर से, इधर से, आप लोग (आईये) । शार्ङ्गरव:-- हे शारद्वत (मैं समझता हूँ कि) यद्यपि, मर्यादा का उलंघन न करने वाले (मर्यादा के रक्षक) ये राजा अत्यन्त श्रेष्ठ हैं और (इनके राज्य में) वर्णो में कोई नीच व्यक्ति भी कुमार्ग पर नहीं चलता, तथापि निरन्तर एकान्त के अभ्यस्त मन से, मैं लोगो से भरे हुये इस (राजमहल) को अग्नि से घिरे हुये घर की भाँति अनुभव कर रहा हूँ ।
शारद्वतः:-- यह ठीक ही है कि आप नगर (पुर) में प्रवेश करने से इस प्रकार के हो गये हैं (अर्थात्‌ ऐसा आप को अनुभव हो रहा है) । मैं भी यहाँ के सुखों में आसक्त लोगों को मैं उसी प्रकार समझ रहा हूँ जिस प्रकार नहाया हुआ व्यक्ति तेल लगाये हुये व्यक्ति को, पवित्र व्यक्ति अपवित्र को, जगा हुआ व्यक्ति सोये हुये को और स्वच्छन्द विचरण करने वाला व्यक्ति बंधे हुये को (समझता है) ।
शकुन्तला:-- (अपशकुन को सूचित कर) ओह, क्यो मेरा दाहिना नेत्र फड़क रहा है? गौतमी:-- बेटी अमंगल नष्ट हो । पतिकुल के देवता तुम्हें सुख प्रदान करें । (घूमती है) । पुरोहित:-- (राजा की ओर संकेत कर) हे हे तपस्वियो, ये (चार) वर्णो और आश्रमों के रक्षक आदरणीय महाराज पहले से ही आसन से उठकर आप लोगो की प्रतीक्षा कर रहे हैं । इन्हे देखिये अर्थात्‌ इनसे मिलिये । शाङ्गरवः-- हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, यद्यपि (महाराज का) यह (शिष्टाचार प्रदर्शन) प्रशंसनीय है, तथापि हम लोग इस विषय में उदासीन हैं क्योकि वृक्ष फल के आ जाने पर नम्न हो जाते हैं (झुक जाते हैं) । बादल नये जल से (पूर्ण होने पर) बहुत नीचे (पृथ्वी के पास) लटक जाते हैं (अर्थात्‌ बहुत नीचे तक झुक जाते हैं) । (इसी प्रकार) सज्जन समृद्धियों (को पाने) से विनग्र (हो जाते हैं) । यह परोपकारियों का स्वभाव ही है ।
प्रतिहारी:-- महाराज, (ये ऋषिलोग) प्रसन्नमुखकान्ति वाले दिखायी दे रहे हैं । मैं समझती हूँ कि ये ऋषि लोग शान्तिपूर्ण (विश्वस्त) कार्य वाले हैं (अर्थात्‌ किसी शान्तिपूर्ण कार्य से आये हैं) । राजा:-- (शकुन्तला को देखकर) और यह आदरणीय पीले पत्तों के मध्य में नवीन पत्ते (किसलय) के समान तपस्वियो के मध्य में घूंघट वाली (यह स्त्री), जिसके शरीर का सौन्दर्य बहुत अधिक प्रकट (स्पष्ट) नहीं हो रहा है कोन है?
प्रतीहारी:-- महाराज, कौतूहल (जिज्ञासा) पूर्वक भेजा गया (प्रेषित) भी मेरा अनुमान (निश्चय की ओर) नहीं फैल (बढ़) पा रहा है (अर्थात्‌ जिज्ञासा होते हुये भी मैं अपने अनुमान से किसी निष्कर्ष पर पहुंचने में असमर्थ हूँ) इसकी आकृति मनोहर (दर्शनीय) प्रतीत हो रही है । राजा:-- ठीक है, (किन्तु) दूसरे की स्त्री को ध्यान से नहीं देखना चाहिये । शकुन्तला:-- (हाथ को छाती पर रखकर । अपने मन में) हदय, क्यों इस प्रकार कांप रहे हो । आर्यपुत्र के (पूर्व-प्रदर्शित) प्रेम को समझ कर धैर्य तो धारण करो । पुरोहित:-- (आगे जाकर) विविधत्‌ पूजित ये तपस्वी लोग (उपस्थित हैं) । इनके गुरु जी का कुछ सन्देश है । महाराज उसे सुनने की कृपा करें । राजा:-- मैं (सुनने के लिये) सावधान हूँ । ऋषि लोग:-- (हाथों को उठाकर) हे राजन्‌ , आप की जय हो । राजा:-- मैं सभी को प्रणाम करता हूँ । ऋषि लोग:-- अभीष्ट वस्तु से युक्त होवें (अर्थात्‌ अपनी अभीष्ट वस्तु को प्राप्त करें) । राजा:-- मुनि लोग निर्विघ्न तपस्या वाले तो हैं न (अर्थात्‌ मुनि लोगों की तपस्या निर्विघ्न तो चल रही है) ? ऋषि लोग:-- सज्जनों के रक्षक आप के (विद्यमान रहने पर) धार्मिक क्रियाओं में विघ्न कैसे (हो सकता है) ? सूर्य के तपते रहने पर अन्धकार कैसे प्रकट हो सकता है ?
राजा:-- तब तो मेरा राजा (कहा जाना) शब्द सार्थक है । भगवान्‌ कण्व लोगों के मङ्गल के लिये सकुशल तो हैं ? शाद्गरव:-- सिद्धियो से सम्पत्न लोगो की कुशलता (उनके) अधीन होती है । उन्होने जप की नीरोगता (अनामय) के विषय में पूछते हुए ये कहा है । राजा:-- (भगवान्‌ कण्व) क्या आदेश देते हैं ? शाङ्गरव:-- जो आप ने परस्पर शपथ (प्रतिज्ञा) पूर्वक (गान्धर्व विधि से) मेरी पुत्री के साथ विवाह किया है, (आप दोनों के) उस (विवाह कार्य) को प्रसन्न मन वाले मेरे द्वारा अनुमति दे दी गयी है। क्योकि आप हम लोगो के पूजनीय व्यक्तियों मे अग्रगण्य कहे गये (माने गये) हैं और शकुन्तला साक्षात्‌ (शरीरधारिणी) पूजा (सत्क्रिया) है । (इस प्रकार के) समान गुणो वाले वधू और वर को मिलाते हुये ब्रह्मा चिरकाल की (बहुत दिनों से चली आ रही) निन्दा को नहीं प्राप्त हुये।
तो अब इस गर्भवती (शकुन्तला) को अपने साथ धर्माचरण के लिये ग्रहण (स्वीकार) कीजिये । गौतमी:-- आर्य, मैं कुछ कहने की इच्छा वाली (इच्छुक) हूँ । (यद्यपि) मेरे बोलने का अवसर नहीं है, क्योकि इस (शकुन्तला) ने (अपने) (पिता आदि) गुरुजनों की अपेक्षा नहीं की (उनसे अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं समझी) और तुमने (आपने) भी (इसके) बन्धुवान्धवों से नहीं पूछा (विवाह के विषय में इसके या अपने बन्धु-बान्धवों से बात-चीत नहीं की) । (तुम दोनो के) परस्पर के (इस) आचरण (कार्य) पर मैं (तुम दोनों में से) प्रत्येक (किसी एक) को क्या कहूँ |
शकुन्तला:-- (अपने मन में) (देखें), आर्यपुत्र क्या कहते हैं ? राजा:-- यह क्या बात (मेरे सामने) उपस्थित है ? (आप लोग यह क्या कह रहे हैं)? शकुन्तला:-- (अपने मन में) (इनका यह) बात कहना तो अग्रि (की भाँति) है । शाङ्गरव:-- (आप) यह कैसे (कहते हैं) ? आप स्वयं ही लोक-व्यवहार में निपुण हैं । सधवा स्त्री यदि सर्वदा पितृगृह में ही रहती है तो चाहे वह कितनी भी सतीसाध्वी (सदाचारिणी) हो, लोग अन्य प्रकार की (उल्टी) आशङ्का करने लगते हैं (बह व्यभिचारिणी है - ऐसा सोचने लगते हैं) । अतः युवती के बन्धुजन उस युवती को पति के पास ही रखना चाहते हैं, चाहे उसका पति उसे चाहता हो अथवा न चाहता हो ।
राजा:-- तो क्या यह आदरणीय मेरे द्वारा पहले कभी विवाहित हैं (अर्थात्‌ तो क्या मेने पहले इनसे विवाह किया है) ? शकुन्तला:-- (खेदपूर्वक अपने मन में) हृदय तुम्हारी आशङ्का ठीक ही थी । शाङ्खगरव:-- क्या आपका अपने किये गये कार्य के प्रति द्वेष (घृणा) है अथवा धर्म के प्रति (आपकी) विमुखता है अथवा किये गये कार्य का (जान बूज कर) तिरस्कार है ? राजा:-- यह असत्य (झूठी) कल्पना वाला प्रश्न कहाँ से उठ रहा है ? शाङ्खगरव:-- ऐश्वर्य (समृद्धि) के कारण मदान्ध लोगों में प्रायः ये विकार (अवगुण) बढ़ जाते हैं ।
राजा:-- (इस आरोप से) मैं विशेषरूप से तिरस्कृत हआ हूँ । गौतमी:- - बेटी, थोड़ी देर के लिये लज्जा मत करो । मैं तुम्हारे घूँघट को हटाती हूँ । तब (तुम्हारा) पति तुमको पहचानेगा । (कहे गये के अनुसार करती है अर्थात्‌ घूँघट को हटाती है) । राजा:-- (शकुन्तला को देखकर, अपने मन में) इस प्रकार (स्वतः ही) प्राप्त हुये (उपस्थित) इस अम्लान कान्ति वाले सौन्दर्य को मैंने पहले स्वीकार किया है अथवा नहीं - इस बात का निश्चय न कर पाता हुआ भी, प्रातःकाल में, भीतर हिम-कणों से युक्त कुन्द पुष्प को भ्रमर की भाँति, न तो (इसका) उपभोग करने में हूँ न ही (इसे) छोडने में ही समर्थ हो पा रहा हूँ ।
प्रतीहारी:-- (अपने मन में) ओह, स्वामी की धर्मनिष्ठता (धन्य है) । इस प्रकार सरलता से प्राप्त सौन्दर्य को देखकर दूसरा कोन विचार करता है ? शाङ्खरवः:-- हे राजन्‌ , क्यों इस प्रकार चुप बेठे हैं ? राजा:-- हे तपस्वियो, (प्रयत्नपूर्वक) सोचता हुआ भी मैं इन माननीय को (विवाह के रूप में) स्वीकार करने की बात का स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ। तो स्पष्टतः गर्भधारिणी इन (शकुन्तला) के प्रति अपने को पति मानता हुआ मैं कैसे इन्हे स्वीकार करूं ? शकुन्तला:-- (एक ओर मुंह कर) आर्य को विवाह में ही सन्देह है । अब मेरी दूर्‌ तक चढ़ी हुई (पराकाष्ठा को प्राप्त) आशा (महत्वाकांक्षा कहां ?) (अर्थात्‌ सम्राट्‌ की पटरानी बनने की महत्वाकांक्षा का तो कहना ही क्या) । शार्खरव:-- ऐसा मत (कहें) । (तुम्हारे द्वारा) बलपूर्वक उपभोग (बलात्कार) की गयी (अपनी) पुत्री (के गन्धर्व विवाह) को मान्यता देने वाले मुनि (कण्व) तुम्हारे द्वारा क्या (इस प्रकार) अपमान किये जाने योग्य हैं ? चुराये गये अपने (शकुन्तलारूपी) धन को समर्पित करते हुये जिनके द्वारा, चोर की भाँति तुम (योग्य) पत्र बनाये गये ।
शारद्वत:-- शाङ्गरव, तुम अब चुप रहो । शकुन्तला, हम लोगों द्वारा कथनीय बात कह दी गयी (अर्थात्‌ हम लोगों को जो कहना था, वह कह दिया) । ये महाराज इस प्रकार कह रहे हैं । अब तुम इन्हे विश्वसनीय (विश्वास दिलाने वाला) प्रत्युत्तर दो । शकुन्तला:-- (एक ओर मुंह कर) उस प्रकार के (गम्भीर प्रगाढ़) प्रेम के इस (विपरीत) अवस्था में प्राप्त हो जाने पर स्मरण कराने से क्या लाभ ? इस समय मेरी आत्मा शोचनीय (धिक्कार के योग्य) है - यह निश्चित है । (प्रकट रूप में) आर्यपुत्र - (आधा ही कहने पर) अब विवाह के सन्दिग्ध होने पर (विवाह के विषय में सन्देह होने से) यह सम्बोधन उचित नहीं है । हे पुरूवंशी राजन्‌ , पहले आश्रमभूमि में स्वभावतः, निष्कपट (सरल) हृदय वाले इस व्यक्ति को (अर्थात्‌ मुझे) शपथपूर्वक ठगकर (धोखे में डालकर) (अब) इस प्रकर के वचनों से उसका निराकरण करना (कथमपि) उचित नहीं है । राजा:-- (कानों को ठक कर) पाप शान्त हो (अर्थात्‌ ऐसा पापयुक्त वचन मत कहो) । स्वच्छ जल को (मलिन करने वाली) और किनारों के वृक्ष को (गिराने वाली) किनारों को तोड़ती हुयी (ढहाती हुई) नदी की भांति तुम क्यो (अपने) कुल को कलङ्कित और इस व्यक्ति को (अर्थात्‌ मुझको) पतित करना चाहती हो ।
शकुन्तला:-- अच्छा, यदि वास्तव में पर-स्त्री की अशंका से आप के द्वारा इस प्रकार का कथन प्रारम्भ किया गया है (अर्थात्‌ यदि आप दूसरे की स्त्री समझ कर ऐसा कह रहे हैं) तो इस अभिज्ञान (पहचान की अंगूठी) से मैं आप की अशंका को दूर करूंगी । राजा:-- (यह) उत्तम प्रस्ताव (उपाय, कल्प) है । शकुन्तला:-- (अंगूठी के स्थान को स्पर्श कर) ओह, मेरी उंगली अंगूठी से रहित है । (अर्थात्‌ अंगूठी उंगली में नहीं है) । (खेद के साथ गौतमी को देखने लगती है) । गौतमी:-- निश्चय ही शक्रावतार (तीर्थ) में शचीतीर्थ के जल की वन्दना करते समय तुम्हारी अंगूठी गिर गयी होगी । राजा:-- (मुस्कराहट के साथ) जो यह कहा जाता है कि स्रीवर्ग तुरन्त उत्पन्न मति वाली (उपाय सोचने वाली हाजिर जवाब) होती हैं, यह वही हैं । शकुन्तला:-- यहां (अभिज्ञान दिखाने के विषय में) तो भाग्य के द्वारा (अपनी) प्रभुता दिखा दी गयी । (अब) मैं (स्मरण दिलाने के लिये) आप से दूसरी बात करूंगी । राजा:-- अब सुनना ही शोष है । अर्थात्‌ सुनना ही पड़ेगा (यह शकुन्तला पर व्यंग्य है) अर्थात्‌ अंगूठी दिखाने की बात समाप्त हुई अब तो सुनना ही सुनना है । शकुन्तला:-- एक दिन नवमालिका (चमेली) के कुञ्च में कमलिनी के पत्ते के पात्र (दोने) मे रखा ने जल आप के हाथ में था। राजा:-- हाँ, सुन रहा हूँ । शकुन्तला:-- उसी क्षण (समय) मेरा पुत्र वनपालित वह "दीर्घापाङ्ग" नामक मृगशावक (हरिण का बच्चा) आ गया । तब दयालु आप ने "पहले यह (जल) पी ले" इस अभिप्राय से उसे जल पीने के लिये बुलाया किन्तु परिचय न होने के कारण (वह) आप के हाथ के पास नहीं आया । बाद में मेरे द्वारा वही जल (अपने) हाथ में ले लेने पर उस (मृगशावक) ने जल में प्रेम प्रदर्शित कर दिया (अर्थात्‌ जल पी लिया) । तब आपने इस प्रकार हंसी उडायी थी कि सभी अपने पर विश्वास करते हैं । (क्योकि) तुम दोनों ही यहाँ वनवासी (वन में सहवासी) हो । राजा:-- अपने कार्य को सिद्ध करने वाली स्त्रियों के इस प्रकार के असत्यमयवाणीरूप मधु से (झूठ और मधुर वचनों से) कामी लोग आकृष्ट किये जाते हैं । गौतमी:-- महानुभाव, ऐसा नहीं कहना चाहिये, क्योकि तपोवन में (सम्पन्न पालनपोषण से) बढ़ा हुआ यह व्यक्ति (शकुन्तला) छल-कपट से अनभिज्ञ है । राजा:-- हे वृद्ध तपस्विनी, जब शिक्षा के बिना ही स्त्रियों की चतुरता (चालाकी) मनुष्य जाति से भिन्न स्त्रियों में (भी) दिखायी पड़ती है, (तो) जो ज्ञानसम्पन्न (मानव-स्त्रियां है उनका) क्या कहना । कोयल आकाश में उड़ने से पहले अपने बच्चों का दूसरे पक्षियों (कौओ) द्वारा पालन करवाती हैं ।
शकुन्तला:-- (क्रोधपूर्वक) नीच, (तुम) अपने हृदय के अनुमान से (अर्थात्‌ अपने हृदय के समान सबको) देखते (समझते) हो । इस समय (तुम्हारे अतिरिक्त) दूसरा कोन (व्यक्ति होगा जो) तिनकों से आच्छादित कुएं के समान धर्म का आवरण (चोगा) धारण किये हुये (पहने हुये) तुम्हारा अनुकरण करेगा ? (अर्थात्‌ तुम जैसा पाखण्डी दूसरा नहीं होगा) । राजा:-- (अपने मन में) मुझे सन्देह युक्त बुद्धि वाला करता (बनाता) हुआ इसका क्रोध निश्छल (बनावट से रहित आकृत्रिम सा) दिखायी पड़ रहा है । क्योकि इसके द्वारा विस्मरण के कारण कठोर मनोवृत्ति वाले मेरे द्वारा ही एकान्त में सम्पन्न हुये प्रणय-सम्बन्ध को स्वीकार न करने पर, अत्यन्त क्रोध के कारण अत्यधिक लाल नेत्रो वाली इस (शकुन्तला) ने (अपनी) टेढ़ी भंहों को चढ़ाकर मानों कामदेव का धनुष तोड़ दिया है ।
(प्रकट रूप में) भद्रे, दुष्यन्त का चरित प्रख्यात है । तथापि मैं यह नहीं देख पा रहा हूँ (अर्थात्‌ जो आप कह रही हैं उसे याद नहीं कर पा रहा हूँ) । शकुन्तला:-- अच्छा, तो अब मैं स्वच्छन्द विचरण करने वाली (दुश्चरित सिद्ध) कर दी गयी हूँ । जो मैं पुरुवंश के विश्वास से मुख में मधु (अर्थात्‌ ऊपर से मीठे) और हदय में विष भरे हुये इस (राजा) के हाथ मे पड़ गयी हूँ । (आञ्चल से मुख को ढककर रोती है) शार्खरवः-- (बिना किसी से पूछे) अपने आप की गयी अनियन्तरित चपलता इसी प्रकार जलाती (दुख देती) है । इसलिये एकान्त का (प्रेम-विवाहादि) सम्बन्ध विशेषरूप से परीक्षा कर करना चाहिये । अज्ञात हृदय वाले लोगो के साथ किया गया प्रेम इसी प्रकार वैर के रूप मे बदल जाता है (अर्थात्‌ दुःखान्त बन जाता है) ।
राजा:-- हे महानुभाव, इन आदरणीय (शकुन्तला) (की बातें) पर विश्वास कर लेने के कारण दोषयुक्त शब्दों के द्वारा हमें क्यों दुःखित कर रहे हो ? शाङ्खरव:-- (ईष्यापूर्वक) सुन लिया गया, आप लोगो के द्वारा (दिया गया) यह नीचता पूर्ण उत्तर । (अर्थात्‌ सुन लिया, आप लोगों का नीचतापूर्ण उत्तर) । जिसने जन्म से लेकर (आज तक) धूर्तता (शठता) को नहीं सीखा है, उस व्यक्ति का वचन (कथन) अप्रामाणिक (प्रमाणरहित) है और जो "दूसरों को धोखा देना विद्या (कला) है" - ऐसा (मानकर उसे) सीखते हैं, वे ही सत्य वचन बोलने वाले (प्रामाणिक वचन वाले) हैं ?
राजा:-- हे सत्यवादी, अच्छा मेरे द्वारा (जैसा आप कहते हैं) वैसा मान लिया गया । (अर्थात्‌ मैंने मान लिया कि मैं झूठा हूँ) । किन्तु इस (स्त्री) को ठगकर (मुझे) क्या मिलेगा ? शार्ङ्गरव:-- अधःपतन (मिलेगा) । राजा:-- पोरवों (पुरुवंश मे उत्पन्न राजाओं) के द्वारा अधःपतन चाहा जाता है (अर्थात्‌ पुरुवंशी राजा अपना अधःपतन चाहते हैं) - यह विश्वास के योग्य नहीं है । शारद्वत:-- शार्ङ्गरव, उत्तर देने से क्या (लाभ) ? (हम लोगों द्वारा) गुरुजी का सन्देश पूरा कर दिया गया (अर्थात्‌ कह दिया गया) हम लोग लौट चलें । (राजा से) तो यह (शकुन्तला) आप की प्रेयसी (पत्नी) है, इसको आप छोड़ें अथवा ग्रहण करें । क्योकि पत्नी पर (पति की) सभी प्रकार की प्रभुता (अधिकार) मानी गयी है ।
गौतमी:-- आगे आगे चलो । (सभी प्रस्थान कर देते हैं) । शकुन्तला:-- इस धूर्त के द्वारा मैं कैसी ठगी गयी हूँ ? तुम लोग भी मुझे छोड़ रहे हो) । (पीछे-पीछे चलने लगती है) । गौतमी:-- (रुककर) बेटा, शार्ङ्गरव, करुण विलाप करती हुई यह शकुन्तला हम लोगो के पीछे-पीछे आ रही है । पति के निष्ठुर परित्याग कर दिये जाने पर (अब) मेरी बिटिया क्या करे ? शा्ङ्गरव:-- (मुड़कर क्रोधपूर्वक) अरी दुष्टा, क्यों तुम स्वतन्त्रता का सहारा ले रही हो ! (शकुन्तला डरकर कांपने लगती है) । शाङ्गरव:-- शकुन्तला, जैसा राजा कह रहे हैं, यदि तुम वैसी (ही) हो (तो) कुलमर्यादा को भङ्ग करने वाली (कुलकलङ्किनी) तुमसे पिता का क्या (प्रयोजन) ? ओर यदि तुम अपने आचरण को पवित्र समझती हो (तो) पति के घर में तुम्हारी दासता (दासी के रूप मे रहना) भी उचित (हितकर) है ।
तुम (यहीं) ठहरो, हम लोग जा रहे हैं । राजा:-- हे तपस्वी, क्यो (इन) आदरणीय को धोखा दे रहे हो । चन्द्रमा कुमुदो को ही और सूर्य कमलो को ही विकसित करता है । क्योकि जितेन्द्रिय लोगों की मनोवृति परस्त्री के सम्पर्क से विमुख (होती है) ।
शा्ङ्गरव:-- जब आप अन्य (रानियों) में आसक्त हो जाने के कारण पहले ही घटना को भूल गये हैं तब अधर्म से डरने वाले कैसे (हैं) ? राजा:-- (पुरोहित के प्रति) आप से ही इस विषय में उचित-अनुचित पूछ रहा हूँ । मैं विवेकहीन हो रहा हूँ (अर्थात्‌ मैं ही भूल रहा हूँ) अथवा यह (स्त्री) झूठ बोल रही है - इस प्रकार का सन्देह होने पर मैं पत्नी-परित्यागी होऊं (बनू) अथवा परख (दूसरे की स्त्री) के स्पर्श से दूषित (होऊं) ।
पुरोहित:-- (विचार कर) यदि (ऐसी बात है) तो इस प्रकार कीजिये । राजा:-- आप मुझे आदेश दें । पुरोहित:-- तो ये मान्य (शकुन्तला) (सन्तानोत्पत्ति) तक हमारे घर रहें । यदि (आप यह पूछें कि) यह (मेरे द्वारा) क्यों कहा जा रहा है ? (तो सुनें) आप को (ज्योतिर्विद्‌) महात्माओं द्वारा पहले ही बताया गया है कि आप सर्वप्रथम ही चक्रवर्ती पुत्र को उत्पन्न करेंगे । यदि वह मुनि (कण्व) का दौहित्र (पुत्री से उत्पन्न पत्र) उस (चक्रवर्ती) के लक्षण से युक्त होगा, (तो) अभिनन्दन कर इन (माननीय शकुन्तला) को अन्तःपुर में प्रवेश कराइयेगा । अन्यथा ( इसके विपरीत होने पर) तो इनका (इनके) पिता (कण्व) के समीप भेजना निश्चित ही है । राजा:-- जैसा गुरुजन को अच्छा लगे (वैसा ही होगा) । पुरोहित:-- बेटी, मेरे पीछे-पीछे आओ । शकुन्तला:-- हे भगवती वसुन्धरा (हे पृथ्वी माता), मुझे (अपने अन्दर) छिद्र (स्थान) दो। (रोती हई प्रस्थान करती है । पुरोहित और तपस्वियो के साथ निकल जाती है) (शाप से लुप्त स्मृति वाला राजा शकुन्तला के ही विषय में विचार करता है) । (नेपथ्य में) आश्वर्य है, आशर्य है । राजा:-- (सुनकर) क्या हो गया है ? (प्रवेश करके) पुरोहित:-- (आशर्य के साथ) महाराज, बड़ा आश्चर्य हो गया है । राजा:-- कैसा ? पुरोहित:-- महाराज, कण्व के शिष्यों के लौट जाने पर वह बाला (शकुन्तला) अपने भाग्य की निन्दा करती हुई हाथों को उठाकर रोने लगी । राजा:-- तब फिर क्या हुआ ? पुरोहित:-- शची- तीर्थ (अप्सरा-तीर्थ) के पास ही स्त्री के समान आकार वाली एक ज्योति (तेजोमयी मूर्ति) उस (शकुन्तला) को उठाकर चली गयी (अर्थात्‌ अदृश्य हो गयी) ।
(सभी लोग आश्चर्य का अभिनय करते हैं) राजा:-- भगवन्‌ , पहले भी हम लोगों द्वारा उस (शकुन्तला रूप) वस्तु का निराकरण कर दिया गया था । (अब) आप व्यर्थ के तर्क से (उसको) क्यों खोजते हैं ? आप विश्राम कीजिये । पुरोहित:-- (देखकर) आप की विजय हो । ( निकल जाता है ) । राजा:-- वेत्रवती, मैं व्याकुल हो गया हूँ । शयन स्थान का मार्ग बताओ । प्रतीहारी:-- महाराज, ईधर से, इधर से (आईये) । (चल पड़ती है) राजा:-- (मन में) यद्यपि परित्यक्त (तिरस्कृत) की गयी मुनि-पुत्री (शकुन्तला) को पत्नी के रूप में (ग्रहण करने की बात को) नहीं स्मरण कर पा रहा हूँ; तथापि अत्यधिक दुःखित होता हुआ (मेरा) हृदय मुझको मानो विश्वास दिला रहा है (कि वह मेरी पत्नी है)। (सभी निकल जाते हैं) ॥ पञ्चम अंक समाप्त ॥
Krishjan
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