गौतमी:--
आगे आगे चलो । (सभी प्रस्थान कर देते हैं) ।
शकुन्तला:--
इस धूर्त के द्वारा मैं कैसी ठगी गयी हूँ ? तुम लोग भी मुझे छोड़ रहे हो) । (पीछे-पीछे चलने लगती है) ।
गौतमी:--
(रुककर) बेटा, शार्ङ्गरव, करुण विलाप करती हुई यह शकुन्तला हम लोगो के पीछे-पीछे आ रही है । पति के निष्ठुर परित्याग कर दिये जाने पर (अब) मेरी बिटिया क्या करे ?
शा्ङ्गरव:--
(मुड़कर क्रोधपूर्वक) अरी दुष्टा, क्यों तुम स्वतन्त्रता का सहारा ले रही हो !
(शकुन्तला डरकर कांपने लगती है) ।
शाङ्गरव:--
शकुन्तला, जैसा राजा कह रहे हैं, यदि तुम वैसी (ही) हो (तो) कुलमर्यादा को भङ्ग करने वाली (कुलकलङ्किनी) तुमसे पिता का क्या (प्रयोजन) ? ओर यदि तुम अपने आचरण को पवित्र समझती हो (तो) पति के घर में तुम्हारी दासता (दासी के रूप मे रहना) भी उचित (हितकर) है ।
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