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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 27
गौतमी- गच्छाग्रतः । (इति प्रस्थिताः) शकुन्तला--कथमनेन कितवेन विग्रलब्धाऽस्मि ? यूयमपि मां परित्यजथ । गौोतमी- (स्थित्वा) वत्स शाङ्गरव, अनुगच्छतीय खलु नः करुणपरिदेविनी शकुन्तला । प्रत्यादेशपरुषे भर्तरि कि वा मे पुत्रिका करोतु ? शा्ङ्गरव- (सरोषं निवृत्य) कि पुरोभागे, स्वातच्यमवलम्बसे। (शकुन्तला भीता वेपते) शाङ्खरवः-- शकुन्तले, यदि यथा वदति क्षितिपस्तथा त्वमसि किं पितुरुत्कुलया त्वया । अथ तु वेत्सि शुचि व्रतमात्मनः पतिकुले तव दास्यमपि क्षमम्‌ ।।
गौतमी:-- आगे आगे चलो । (सभी प्रस्थान कर देते हैं) । शकुन्तला:-- इस धूर्त के द्वारा मैं कैसी ठगी गयी हूँ ? तुम लोग भी मुझे छोड़ रहे हो) । (पीछे-पीछे चलने लगती है) । गौतमी:-- (रुककर) बेटा, शार्ङ्गरव, करुण विलाप करती हुई यह शकुन्तला हम लोगो के पीछे-पीछे आ रही है । पति के निष्ठुर परित्याग कर दिये जाने पर (अब) मेरी बिटिया क्या करे ? शा्ङ्गरव:-- (मुड़कर क्रोधपूर्वक) अरी दुष्टा, क्यों तुम स्वतन्त्रता का सहारा ले रही हो ! (शकुन्तला डरकर कांपने लगती है) । शाङ्गरव:-- शकुन्तला, जैसा राजा कह रहे हैं, यदि तुम वैसी (ही) हो (तो) कुलमर्यादा को भङ्ग करने वाली (कुलकलङ्किनी) तुमसे पिता का क्या (प्रयोजन) ? ओर यदि तुम अपने आचरण को पवित्र समझती हो (तो) पति के घर में तुम्हारी दासता (दासी के रूप मे रहना) भी उचित (हितकर) है ।
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