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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 25
राजा--अयि भोः, किमत्रभवतीप्रत्ययादेवास्मान्‌ सयुतदोषाक्षरैः क्षिणुथ ? । शाङ्खरवः- (सासूयम्‌) श्रुतं भवद्धिरधरोत्तरम्‌ । आ जन्मनः शाठ्यमशिक्षितो यस्तस्याप्रमाणं वचनं जनस्य । परातिसन्धानमधीयते यैर्विद्येति ते सन्तु किलाप्तवाचः ।।
राजा:-- हे महानुभाव, इन आदरणीय (शकुन्तला) (की बातें) पर विश्वास कर लेने के कारण दोषयुक्त शब्दों के द्वारा हमें क्यों दुःखित कर रहे हो ? शाङ्खरव:-- (ईष्यापूर्वक) सुन लिया गया, आप लोगो के द्वारा (दिया गया) यह नीचता पूर्ण उत्तर । (अर्थात्‌ सुन लिया, आप लोगों का नीचतापूर्ण उत्तर) । जिसने जन्म से लेकर (आज तक) धूर्तता (शठता) को नहीं सीखा है, उस व्यक्ति का वचन (कथन) अप्रामाणिक (प्रमाणरहित) है और जो "दूसरों को धोखा देना विद्या (कला) है" - ऐसा (मानकर उसे) सीखते हैं, वे ही सत्य वचन बोलने वाले (प्रामाणिक वचन वाले) हैं ?
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