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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 8
द्वितीयः-- द्वितीयनियमयसि विमारप्रस्थितानात्तदण्डः प्रशमयसि विवादं कल्पसे रक्षणाय । अतनुषु विभवेषु ज्ञातयः सन्तु नाम त्वयि तु -परिसमाप्त बन्धुकृत्य प्रजानाम्‌ ।।
राजदण्ड को धारण किये हये तुम (आप) कुमार्ग पर जाने वाले लोगों को नियंत्रित करते हो (सन्मार्ग पर चलने के लिये बाध्य करते हो), (प्रजा के आपसी) विवादों (झगड़ों) को शान्त (समाप्त) करते हो और (प्रजा की) रक्षा में समर्थ हो । विशाल ऐश्वर्य के होने पर भले ही (बहुत से) सम्बन्धी (बन्धु-वान्धव) हो जाएँ, (किन्तु) प्रजा (लोगों) का बन्धु- बान्धवो के द्वारा सम्पन्न होने वाला कार्य (बन्धु-कार्य) तो आप में (ही) पूर्णं हाता है । (अर्थात्‌ प्रजा का बन्धु-कार्य आप ही पूरा करते हैं) ।
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