राजदण्ड को धारण किये हये तुम (आप) कुमार्ग पर जाने वाले लोगों को नियंत्रित करते हो (सन्मार्ग पर चलने के लिये बाध्य करते हो), (प्रजा के आपसी) विवादों (झगड़ों) को शान्त (समाप्त) करते हो और (प्रजा की) रक्षा में समर्थ हो । विशाल ऐश्वर्य के होने पर भले ही (बहुत से) सम्बन्धी (बन्धु-वान्धव) हो जाएँ, (किन्तु) प्रजा (लोगों) का बन्धु- बान्धवो के द्वारा सम्पन्न होने वाला कार्य (बन्धु-कार्य) तो आप में (ही) पूर्णं हाता है । (अर्थात् प्रजा का बन्धु-कार्य आप ही पूरा करते हैं) ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।