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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 29
शा्ङ्गरव:-- यदा तु पूर्ववृत्तमन्यसङ्गाद्‌ विस्मृतो भवांस्तदा कथमधर्मभीरुः ? राजा- (पुरोहितं प्रति) भवन्तमेवात्र गुरुलाघवं पृच्छामि । मूढः स्यामहमेषा वा वदेन्मिथ्येति संशये । दारत्यागी भवाम्याहो परख्रीस्पशपासुलः ।।
शा्ङ्गरव:-- जब आप अन्य (रानियों) में आसक्त हो जाने के कारण पहले ही घटना को भूल गये हैं तब अधर्म से डरने वाले कैसे (हैं) ? राजा:-- (पुरोहित के प्रति) आप से ही इस विषय में उचित-अनुचित पूछ रहा हूँ । मैं विवेकहीन हो रहा हूँ (अर्थात्‌ मैं ही भूल रहा हूँ) अथवा यह (स्त्री) झूठ बोल रही है - इस प्रकार का सन्देह होने पर मैं पत्नी-परित्यागी होऊं (बनू) अथवा परख (दूसरे की स्त्री) के स्पर्श से दूषित (होऊं) ।
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