(प्रकट रूप में) भद्रे, दुष्यन्त का चरित प्रख्यात है । तथापि मैं यह नहीं देख पा रहा हूँ (अर्थात् जो आप कह रही हैं उसे याद नहीं कर पा रहा हूँ) ।
शकुन्तला:--
अच्छा, तो अब मैं स्वच्छन्द विचरण करने वाली (दुश्चरित सिद्ध) कर दी गयी हूँ । जो मैं पुरुवंश के विश्वास से मुख में मधु (अर्थात् ऊपर से मीठे) और हदय में विष भरे हुये इस (राजा) के हाथ मे पड़ गयी हूँ ।
(आञ्चल से मुख को ढककर रोती है)
शार्खरवः--
(बिना किसी से पूछे) अपने आप की गयी अनियन्तरित चपलता इसी प्रकार जलाती (दुख देती) है । इसलिये एकान्त का (प्रेम-विवाहादि) सम्बन्ध विशेषरूप से परीक्षा कर करना चाहिये । अज्ञात हृदय वाले लोगो के साथ किया गया प्रेम इसी प्रकार वैर के रूप मे बदल जाता है (अर्थात् दुःखान्त बन जाता है) ।
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