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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 24
(प्रकाशम्‌) भद्रे, प्रथित दुष्यन्तस्य चरितम्‌ । तथापीदं न लक्षये । शकुन्तला- सुष्ठु तावदत्र स्वच्छन्दचारिणी कृतास्मि । याऽहमस्य पुरुवंशप्रत्ययेन मुखमधोर्हदयस्थितविषस्य हस्ताभ्याशमुपगता । (इति पटान्तेन मुखमावृत्य रोदिति) । शार्खरवः--इत्थमात्सकृतमप्रतिहतं चापलं दहति । अतः परीक्ष्य कर्तव्यं विशेषात्‌ सङ्कतं रहः । अज्ञातहदयेष्वेवं वैरीभवति सौहदम्‌ ।।
(प्रकट रूप में) भद्रे, दुष्यन्त का चरित प्रख्यात है । तथापि मैं यह नहीं देख पा रहा हूँ (अर्थात्‌ जो आप कह रही हैं उसे याद नहीं कर पा रहा हूँ) । शकुन्तला:-- अच्छा, तो अब मैं स्वच्छन्द विचरण करने वाली (दुश्चरित सिद्ध) कर दी गयी हूँ । जो मैं पुरुवंश के विश्वास से मुख में मधु (अर्थात्‌ ऊपर से मीठे) और हदय में विष भरे हुये इस (राजा) के हाथ मे पड़ गयी हूँ । (आञ्चल से मुख को ढककर रोती है) शार्खरवः-- (बिना किसी से पूछे) अपने आप की गयी अनियन्तरित चपलता इसी प्रकार जलाती (दुख देती) है । इसलिये एकान्त का (प्रेम-विवाहादि) सम्बन्ध विशेषरूप से परीक्षा कर करना चाहिये । अज्ञात हृदय वाले लोगो के साथ किया गया प्रेम इसी प्रकार वैर के रूप मे बदल जाता है (अर्थात्‌ दुःखान्त बन जाता है) ।
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