मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 1
(ततः प्रविशत्यासनस्थो राजाः विदूषकश्च) विदूषकः- (कर्णं दत्वा). भो वयस्य, सङ्धीतशालान्तरेऽवधानं देहि । कलविशुद्धाम्रा गीतेः स्वरसंयोगः श्रूयते । जाने तत्रभवती हंसपदिका वर्णपरिचयं करोतीति । राज्ञा-तुष्णी भव । यावदाकरण्यामि ॥ (आकाशो गीयते) अभिनवमधुलोलुपस्त्वं तथा परिचुम्ब्य चूतमञ्जरीम्‌ । कमलवसतिमात्रनिर्वृतो मधुकर विस्मृतोऽस्येनां कथम्‌ ।।
(तत्पश्चात्‌ आसन पर बैठे हुए राजा और विदूषक प्रवेश करते हैं) विदूषक:-- (कान लगाकर) हे मित्र ! संगीतशाला के भीतर ध्यान दीजिये । अस्पष्ट-मधुर ध्वनियुक्त शुद्धा नामक गीति का स्वर आलाप (सुरीला तान) सुनायी पड़ रहा है । मैं समझता हूँ कि माननीया (रानी) हंसपदिका वर्णों का परिचय (गीति क्रम का परिचय प्राप्त) कर रही हैं । राजा:-- चुप (शान्त) हो जाओ । जब तक मैं सुनता हूँ । (आकाश में गाया जाता है) हे भ्रमर ! नवीन मधु (अनास्वादित पुष्परस) के लोभी तुम आम की मञ्जरी को उस प्रकार (अत्यधिक प्रेम से) चुम्बन (रसास्वादन) कर (अब) कमल में निवासमात्र से सन्तुष्ट (होकर) इस (आम्रमञ्चरी) को कैसे भूल गये हो ?
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें