(तत्पश्चात् आसन पर बैठे हुए राजा और विदूषक प्रवेश करते हैं)
विदूषक:--
(कान लगाकर) हे मित्र ! संगीतशाला के भीतर ध्यान दीजिये । अस्पष्ट-मधुर ध्वनियुक्त शुद्धा नामक गीति का स्वर आलाप (सुरीला तान) सुनायी पड़ रहा है । मैं समझता हूँ कि माननीया (रानी) हंसपदिका वर्णों का परिचय (गीति क्रम का परिचय प्राप्त) कर रही हैं ।
राजा:--
चुप (शान्त) हो जाओ । जब तक मैं सुनता हूँ ।
(आकाश में गाया जाता है)
हे भ्रमर ! नवीन मधु (अनास्वादित पुष्परस) के लोभी तुम आम की मञ्जरी को उस प्रकार (अत्यधिक प्रेम से) चुम्बन (रसास्वादन) कर (अब) कमल में निवासमात्र से सन्तुष्ट (होकर) इस (आम्रमञ्चरी) को कैसे भूल गये हो ?
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