(नेपथ्य में) दो चारण (स्तुतिपाठक):--
महाराज की जय हो, अपने सुख की अभिलाषा न करने वाले (आप) प्रजा (के हित) के लिये प्रतिदिन कष्ट उठाते हैं, अथवा आप का कार्य (ही) ऐसा है । क्योकि वृक्ष (अपने) सिर पर प्रचण्ड (तीक्ष्ण) धूप को सहन करता है (किन्तु) अपनी छाया से आश्रित लोगों के सन्ताप को शान्त (दूर) करता है ।
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