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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 7
(नेपथ्ये) वैतालिकौ- विजयतां देवः । प्रथमः-- प्रथम-स्वसुखनिरभिलाषः खिद्यसे लोकहेतोः प्रतिदिनमथवा ` ते वृत्तिरेवविधैव । अनुभवति हि मूर्ध्नां पादपस्तीत्रमुष्णं शमयति परितापं छायया संश्रितानाम्‌ ।।
(नेपथ्य में) दो चारण (स्तुतिपाठक):-- महाराज की जय हो, अपने सुख की अभिलाषा न करने वाले (आप) प्रजा (के हित) के लिये प्रतिदिन कष्ट उठाते हैं, अथवा आप का कार्य (ही) ऐसा है । क्योकि वृक्ष (अपने) सिर पर प्रचण्ड (तीक्ष्ण) धूप को सहन करता है (किन्तु) अपनी छाया से आश्रित लोगों के सन्ताप को शान्त (दूर) करता है ।
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