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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 4
भोः कामं धर्मकार्यमनतिषात्यं देवस्य । तवापीदानीषैव धमसिनादुत्थितायं पुनरुपरो धव्छारि कण्वशिष्यागमनमस्मै नोत्सहे निवेदयितुम्‌ ।अथवाऽविश्रमोऽयं लोकतन्त्राधिकारः । कुतः-- भानुः सकृद्युक्ततुरङ्ग एव रात्रिन्दिवं गन्धवहः प्रयाति । शेषः सदैवाहितभूमिभारः षष्ठांशवृत्तेरपि धर्म एषः ।।
अरे, यद्यपि महाराज के लिये धर्मकार्य अतुलनीय हैं तथापि अभी ही न्यायासन (धर्मासन) से उठकर (गये हुए) इस (महाराज) से फिर (विश्राम में) विघ्न करने (बाधा डालने) वाले कण्व के शिष्यों के आगमन (के समाचार) को कहने में समर्थ नहीं हूँ । अथवा यह लोकतंत्र का अधिकार (प्रजा की रक्षा का अधिकार) विश्राम-रहित होता है (अर्थात्‌ प्रजा की रक्षा में लगे हुए राजा को विश्राम का अवसर कहाँ मिल सकता है) क्योकि सूर्य ने एक बार ही (अपने रथ में) घोड़ों को जोता है । वायु रात-दिन चलती (बहती) रहती है । शेषनाग सर्वदा ही पृथ्वी के भार को धारण किये रहते हैं । (प्रजा से कर के रूप में आय को) छठा भाग लेने वाले (अर्थात्‌ राजा) का भी यही कर्तव्य (धर्म) है ।
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