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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 13
प्रतिहारी- देव, प्रसन्नमुखवर्णा दृश्यन्ते 1 जानामि विश्रव्यकार्या ऋषयः । राजा-(शकुन्तलां दृष्टवा) अथात्रभवती-- का स्विदवगुण्ठनवती नातिपरिस्फुटशरीरलावण्या। मध्ये तपोधनानां किसलयमिव पाण्डुपत्राणाम्‌ ।।
प्रतिहारी:-- महाराज, (ये ऋषिलोग) प्रसन्नमुखकान्ति वाले दिखायी दे रहे हैं । मैं समझती हूँ कि ये ऋषि लोग शान्तिपूर्ण (विश्वस्त) कार्य वाले हैं (अर्थात्‌ किसी शान्तिपूर्ण कार्य से आये हैं) । राजा:-- (शकुन्तला को देखकर) और यह आदरणीय पीले पत्तों के मध्य में नवीन पत्ते (किसलय) के समान तपस्वियो के मध्य में घूंघट वाली (यह स्त्री), जिसके शरीर का सौन्दर्य बहुत अधिक प्रकट (स्पष्ट) नहीं हो रहा है कोन है?
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