शकुन्तला:--
अच्छा, यदि वास्तव में पर-स्त्री की अशंका से आप के द्वारा इस प्रकार का कथन प्रारम्भ किया गया है (अर्थात् यदि आप दूसरे की स्त्री समझ कर ऐसा कह रहे हैं) तो इस अभिज्ञान (पहचान की अंगूठी) से मैं आप की अशंका को दूर करूंगी ।
राजा:--
(यह) उत्तम प्रस्ताव (उपाय, कल्प) है ।
शकुन्तला:--
(अंगूठी के स्थान को स्पर्श कर) ओह, मेरी उंगली अंगूठी से रहित है । (अर्थात् अंगूठी उंगली में नहीं है) । (खेद के साथ गौतमी को देखने लगती है) ।
गौतमी:--
निश्चय ही शक्रावतार (तीर्थ) में शचीतीर्थ के जल की वन्दना करते समय तुम्हारी अंगूठी गिर गयी होगी ।
राजा:--
(मुस्कराहट के साथ) जो यह कहा जाता है कि स्रीवर्ग तुरन्त उत्पन्न मति वाली (उपाय सोचने वाली हाजिर जवाब) होती हैं, यह वही हैं ।
शकुन्तला:--
यहां (अभिज्ञान दिखाने के विषय में) तो भाग्य के द्वारा (अपनी) प्रभुता दिखा दी गयी । (अब) मैं (स्मरण दिलाने के लिये) आप से दूसरी बात करूंगी ।
राजा:--
अब सुनना ही शोष है । अर्थात् सुनना ही पड़ेगा (यह शकुन्तला पर व्यंग्य है) अर्थात् अंगूठी दिखाने की बात समाप्त हुई अब तो सुनना ही सुनना है ।
शकुन्तला:--
एक दिन नवमालिका (चमेली) के कुञ्च में कमलिनी के पत्ते के पात्र (दोने) मे रखा ने जल आप के हाथ में था।
राजा:--
हाँ, सुन रहा हूँ ।
शकुन्तला:--
उसी क्षण (समय) मेरा पुत्र वनपालित वह "दीर्घापाङ्ग" नामक मृगशावक (हरिण का बच्चा) आ गया । तब दयालु आप ने "पहले यह (जल) पी ले" इस अभिप्राय से उसे जल पीने के लिये बुलाया किन्तु परिचय न होने के कारण (वह) आप के हाथ के पास नहीं आया । बाद में मेरे द्वारा वही जल (अपने) हाथ में ले लेने पर उस (मृगशावक) ने जल में प्रेम प्रदर्शित कर दिया (अर्थात् जल पी लिया) । तब आपने इस प्रकार हंसी उडायी थी कि सभी अपने पर विश्वास करते हैं । (क्योकि) तुम दोनों ही यहाँ वनवासी (वन में सहवासी) हो ।
राजा:--
अपने कार्य को सिद्ध करने वाली स्त्रियों के इस प्रकार के असत्यमयवाणीरूप मधु से (झूठ और मधुर वचनों से) कामी लोग आकृष्ट किये जाते हैं ।
गौतमी:--
महानुभाव, ऐसा नहीं कहना चाहिये, क्योकि तपोवन में (सम्पन्न पालनपोषण से) बढ़ा हुआ यह व्यक्ति (शकुन्तला) छल-कपट से अनभिज्ञ है ।
राजा:--
हे वृद्ध तपस्विनी, जब शिक्षा के बिना ही स्त्रियों की चतुरता (चालाकी) मनुष्य जाति से भिन्न स्त्रियों में (भी) दिखायी पड़ती है, (तो) जो ज्ञानसम्पन्न (मानव-स्त्रियां है उनका) क्या कहना । कोयल आकाश में उड़ने से पहले अपने बच्चों का दूसरे पक्षियों (कौओ) द्वारा पालन करवाती हैं ।
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