राजा:--
तब तो मेरा राजा (कहा जाना) शब्द सार्थक है । भगवान् कण्व लोगों के मङ्गल के लिये सकुशल तो हैं ?
शाद्गरव:--
सिद्धियो से सम्पत्न लोगो की कुशलता (उनके) अधीन होती है । उन्होने जप की नीरोगता (अनामय) के विषय में पूछते हुए ये कहा है ।
राजा:--
(भगवान् कण्व) क्या आदेश देते हैं ?
शाङ्गरव:--
जो आप ने परस्पर शपथ (प्रतिज्ञा) पूर्वक (गान्धर्व विधि से) मेरी पुत्री के साथ विवाह किया है, (आप दोनों के) उस (विवाह कार्य) को प्रसन्न मन वाले मेरे द्वारा अनुमति दे दी गयी है। क्योकि आप हम लोगो के पूजनीय व्यक्तियों मे अग्रगण्य कहे गये (माने गये) हैं और शकुन्तला साक्षात् (शरीरधारिणी) पूजा (सत्क्रिया) है । (इस प्रकार के) समान गुणो वाले वधू और वर को मिलाते हुये ब्रह्मा चिरकाल की (बहुत दिनों से चली आ रही) निन्दा को नहीं प्राप्त हुये।
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