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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 23
शकुन्तला- (सरोषम्‌) अनार्य, आत्मनो हृदयानुमानेन पश्यसि । क इदानीमन्यो धर्मकञ्चुकप्रवेशिनस्तृणच्छन्नकूपोपमस्य तवानुकृतिं प्रतिपत्स्यते ? राजा--(आत्मगतम्‌) सन्दिग्धबुद्धिं मां कुर्वन्नकैतव इवास्याः कोपो लक्ष्यते । ' तथा हयनया -- मय्येव विस्मरणदारुणयचित्तवृत्तौ वृत्तं रहः प्रणयमप्रतिपद्यमाने । भेदाद्‌ भ्रुवोः कुटिलयोरतिलोहिताक्ष्या भग्नं शरासनमिवातिरुषा स्मरस्य ।।
शकुन्तला:-- (क्रोधपूर्वक) नीच, (तुम) अपने हृदय के अनुमान से (अर्थात्‌ अपने हृदय के समान सबको) देखते (समझते) हो । इस समय (तुम्हारे अतिरिक्त) दूसरा कोन (व्यक्ति होगा जो) तिनकों से आच्छादित कुएं के समान धर्म का आवरण (चोगा) धारण किये हुये (पहने हुये) तुम्हारा अनुकरण करेगा ? (अर्थात्‌ तुम जैसा पाखण्डी दूसरा नहीं होगा) । राजा:-- (अपने मन में) मुझे सन्देह युक्त बुद्धि वाला करता (बनाता) हुआ इसका क्रोध निश्छल (बनावट से रहित आकृत्रिम सा) दिखायी पड़ रहा है । क्योकि इसके द्वारा विस्मरण के कारण कठोर मनोवृत्ति वाले मेरे द्वारा ही एकान्त में सम्पन्न हुये प्रणय-सम्बन्ध को स्वीकार न करने पर, अत्यन्त क्रोध के कारण अत्यधिक लाल नेत्रो वाली इस (शकुन्तला) ने (अपनी) टेढ़ी भंहों को चढ़ाकर मानों कामदेव का धनुष तोड़ दिया है ।
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