राजा:--
हे सत्यवादी, अच्छा मेरे द्वारा (जैसा आप कहते हैं) वैसा मान लिया गया । (अर्थात् मैंने मान लिया कि मैं झूठा हूँ) । किन्तु इस (स्त्री) को ठगकर (मुझे) क्या मिलेगा ?
शार्ङ्गरव:--
अधःपतन (मिलेगा) ।
राजा:--
पोरवों (पुरुवंश मे उत्पन्न राजाओं) के द्वारा अधःपतन चाहा जाता है (अर्थात् पुरुवंशी राजा अपना अधःपतन चाहते हैं) - यह विश्वास के योग्य नहीं है ।
शारद्वत:--
शार्ङ्गरव, उत्तर देने से क्या (लाभ) ? (हम लोगों द्वारा) गुरुजी का सन्देश पूरा कर दिया गया (अर्थात् कह दिया गया) हम लोग लौट चलें । (राजा से) तो यह (शकुन्तला) आप की प्रेयसी (पत्नी) है, इसको आप छोड़ें अथवा ग्रहण करें । क्योकि पत्नी पर (पति की) सभी प्रकार की प्रभुता (अधिकार) मानी गयी है ।
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