शकुन्तला:--
(अपने मन में) (देखें), आर्यपुत्र क्या कहते हैं ?
राजा:--
यह क्या बात (मेरे सामने) उपस्थित है ? (आप लोग यह क्या कह रहे हैं)?
शकुन्तला:--
(अपने मन में) (इनका यह) बात कहना तो अग्रि (की भाँति) है ।
शाङ्गरव:--
(आप) यह कैसे (कहते हैं) ? आप स्वयं ही लोक-व्यवहार में निपुण हैं । सधवा स्त्री यदि सर्वदा पितृगृह में ही रहती है तो चाहे वह कितनी भी सतीसाध्वी (सदाचारिणी) हो, लोग अन्य प्रकार की (उल्टी) आशङ्का करने लगते हैं (बह व्यभिचारिणी है - ऐसा सोचने लगते हैं) । अतः युवती के बन्धुजन उस युवती को पति के पास ही रखना चाहते हैं, चाहे उसका पति उसे चाहता हो अथवा न चाहता हो ।
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