मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 17
शकुन्तला- (आत्मगतम्‌) किं नु खल्वार्यपुत्रो भणति । राजा-- किमिदमुपन्यस्तम्‌ ? शाकुन्तला-- (आत्मगतम्‌) पावकः खलु वचनोपन्यासः । शारङ्खरवः-- कथमिदं नाम 2 भवन्त एव सुतरां लोकवृत्तान्तनिष्णाताः । सतीमपि ज्ञातिकुलैकसंश्रयां जनोऽन्यथा भर्तृमतीं विशङ्कते । अतः समीपे परिणेतुरिष्यते प्रियाऽप्रिया वा प्रमदा स्वबन्धुभिः ।।
शकुन्तला:-- (अपने मन में) (देखें), आर्यपुत्र क्या कहते हैं ? राजा:-- यह क्या बात (मेरे सामने) उपस्थित है ? (आप लोग यह क्या कह रहे हैं)? शकुन्तला:-- (अपने मन में) (इनका यह) बात कहना तो अग्रि (की भाँति) है । शाङ्गरव:-- (आप) यह कैसे (कहते हैं) ? आप स्वयं ही लोक-व्यवहार में निपुण हैं । सधवा स्त्री यदि सर्वदा पितृगृह में ही रहती है तो चाहे वह कितनी भी सतीसाध्वी (सदाचारिणी) हो, लोग अन्य प्रकार की (उल्टी) आशङ्का करने लगते हैं (बह व्यभिचारिणी है - ऐसा सोचने लगते हैं) । अतः युवती के बन्धुजन उस युवती को पति के पास ही रखना चाहते हैं, चाहे उसका पति उसे चाहता हो अथवा न चाहता हो ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें