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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 28
तिष्ठ । साधयामो वयम्‌ । राजा-- भोः तपस्विन्‌ , किमत्रभवतीं विप्रलभसे ? कुमुदान्येव शशाङ्कः सविता बोधयति पङ्कजान्येव । वशिनां हि परपरिग्रहसश्लेषपराङ्मुखी वृत्तिः ।।
तुम (यहीं) ठहरो, हम लोग जा रहे हैं । राजा:-- हे तपस्वी, क्यो (इन) आदरणीय को धोखा दे रहे हो । चन्द्रमा कुमुदो को ही और सूर्य कमलो को ही विकसित करता है । क्योकि जितेन्द्रिय लोगों की मनोवृति परस्त्री के सम्पर्क से विमुख (होती है) ।
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