मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 2
राजा-अहो, रागपरिवाहिणी गीतिः । विदूषकः-- किं तावद्‌ गीत्या अवगतोऽश्वरार्थः । राजा--(स्मितं कृत्वा) सकृत्कृतप्रणयोऽ यं जनः । तदस्या देवीं वसुमतीमन्तरेण महदुपालम्भनं गतोऽस्मि । सखे माधव्य, मद्वचनादुच्यतां हंसपदिका । निपुणमुपालब्धोऽस्मीति । विदूषकः-- यद्‌ भवानाज्ञापयति । (उत्थाय) भो वयस्य, गृहीतस्य तया परकीयैर्हस्तैः | शिखण्डके ताण्ड्यमानस्याप्सरसा वीतरागस्येव नास्तीदानीं मे मोक्षः । राजा गच्छ ! नागरिकवृत्त्या सञ्ज्ञापयैनाम्‌ । विदूषकः-- का गतिः । (इति निष्क्रान्तः) । राजा (आत्मगतम्‌) किं नु खलु गीतमेवं विधार्थमाकर्ण्ये्टजनविरहादऋतेऽपि बलवदुत्कण्ठितोऽस्मि । अथवा-- रम्याणि वीक्ष्य मधुराश्च निशम्य शब्दान्‌ पर्युत्सुको भवति यत्‌ सुखितोऽपि जन्तुः । तच्चेतसा स्मरति नूनमबोधपूर्वं भावस्थिराणि जननान्तरसौहदानि ।।
राजा:-- अहा, (क्या ही) अनुराग की वर्षा करने वाली गीति है । विदूषक:-- क्या (आप ने) गीत के शब्दों का अर्थ समझ लिया ? राजा:-- (मुस्कराकर) यह व्यक्ति (हंसपदिका) (मेरे द्वारा) एक बार प्रेम किया गया था (अर्थात्‌ इस हंसपदिका से मेने एक बार प्रेम किया था) । देवी वसुमती को लक्ष्य मे रखकर इस (हंसपदिका) ने मुझे बहुत बड़ा उलाहना दिया है । मित्र माधव्य, मेरी ओर से हंसपदिका से कहना कि तुमने मुझे अत्यन्त चतुरता से उलाहना दिया है । विदूषक:-- आपकी जो आज्ञा (आपकी आज्ञा के अनुसार कार्य करुंगा) । (उठकर) हे मित्र, अब उस (हंसपदिका) के द्वारा दूसरी (सेविकाओं) के हाथों से शिखा (चोटी) पकड़ कर मारे जाते हुये मुझको, छुटकारा उसी प्रकार नहीं मिलेगा जिस प्रकार अप्सरा के द्वारा (पकड़े गये) (किसी) विरक्त (संन्यासी) को मुक्ति नहीं मिलती । राजा:-- जाओ । शिष्ट व्यवहार (नागरिक-वृत्ति) से उसको समझा देना । विदूषक:-- क्या उपाय है ? (अर्थात्‌ इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपय नहीं है) । (निकल जाता है) । राजा:-- (अपने मन में) किस कारण से इस प्रकार के भाव (अर्थ) पूर्ण गीत को सुनकर प्रिय व्यक्ति के वियोग के बिना भी अत्यधिक उत्कण्ठित (खिन्न) हो रहा हूँ ? अथवा रमणीय (वस्तुओं) को देखकर और मधुर शब्दों को सुनकर सुखी (प्रसन्नचित्त) प्राणी भी जो उत्कण्ठित (खिन्न) हो जाता है; वह निश्चय ही संस्कार (वासना) के रूप में (हृदय से) विद्यमान पूर्वजन्मों के प्रणय-सम्बन्धों (प्रम व्यवहारो) को अज्ञानपूर्वक मन से स्मरण करता है । ( खित्रावस्था में बेठता है )
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें