राजा:--
अहा, (क्या ही) अनुराग की वर्षा करने वाली गीति है ।
विदूषक:--
क्या (आप ने) गीत के शब्दों का अर्थ समझ लिया ?
राजा:--
(मुस्कराकर) यह व्यक्ति (हंसपदिका) (मेरे द्वारा) एक बार प्रेम किया गया था (अर्थात् इस हंसपदिका से मेने एक बार प्रेम किया था) । देवी वसुमती को लक्ष्य मे रखकर इस (हंसपदिका) ने मुझे बहुत बड़ा उलाहना दिया है । मित्र माधव्य, मेरी ओर से हंसपदिका से कहना कि तुमने मुझे अत्यन्त चतुरता से उलाहना दिया है ।
विदूषक:--
आपकी जो आज्ञा (आपकी आज्ञा के अनुसार कार्य करुंगा) । (उठकर) हे मित्र, अब उस (हंसपदिका) के द्वारा दूसरी (सेविकाओं) के हाथों से शिखा (चोटी) पकड़ कर मारे जाते हुये मुझको, छुटकारा उसी प्रकार नहीं मिलेगा जिस प्रकार अप्सरा के द्वारा (पकड़े गये) (किसी) विरक्त (संन्यासी) को मुक्ति नहीं मिलती ।
राजा:--
जाओ । शिष्ट व्यवहार (नागरिक-वृत्ति) से उसको समझा देना ।
विदूषक:--
क्या उपाय है ? (अर्थात् इसके अतिरिक्त दूसरा कोई उपय नहीं है) । (निकल जाता है) ।
राजा:--
(अपने मन में) किस कारण से इस प्रकार के भाव (अर्थ) पूर्ण गीत को सुनकर प्रिय व्यक्ति के वियोग के बिना भी अत्यधिक उत्कण्ठित (खिन्न) हो रहा हूँ ? अथवा रमणीय (वस्तुओं) को देखकर और मधुर शब्दों को सुनकर सुखी (प्रसन्नचित्त) प्राणी भी जो उत्कण्ठित (खिन्न) हो जाता है; वह निश्चय ही संस्कार (वासना) के रूप में (हृदय से) विद्यमान पूर्वजन्मों के प्रणय-सम्बन्धों (प्रम व्यवहारो) को अज्ञानपूर्वक मन से स्मरण करता है । ( खित्रावस्था में बेठता है )
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