शकुन्तला:--
(अपशकुन को सूचित कर) ओह, क्यो मेरा दाहिना नेत्र फड़क रहा है?
गौतमी:--
बेटी अमंगल नष्ट हो । पतिकुल के देवता तुम्हें सुख प्रदान करें । (घूमती है) ।
पुरोहित:--
(राजा की ओर संकेत कर) हे हे तपस्वियो, ये (चार) वर्णो और आश्रमों के रक्षक आदरणीय महाराज पहले से ही आसन से उठकर आप लोगो की प्रतीक्षा कर रहे हैं । इन्हे देखिये अर्थात् इनसे मिलिये ।
शाङ्गरवः--
हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, यद्यपि (महाराज का) यह (शिष्टाचार प्रदर्शन) प्रशंसनीय है, तथापि हम लोग इस विषय में उदासीन हैं क्योकि वृक्ष फल के आ जाने पर नम्न हो जाते हैं (झुक जाते हैं) । बादल नये जल से (पूर्ण होने पर) बहुत नीचे (पृथ्वी के पास) लटक जाते हैं (अर्थात् बहुत नीचे तक झुक जाते हैं) । (इसी प्रकार) सज्जन समृद्धियों (को पाने) से विनग्र (हो जाते हैं) । यह परोपकारियों का स्वभाव ही है ।
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