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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 12
शकुन्तला- (निमित्तं सूचयित्वा) अहो, किं मे वामेतरं नयनं विस्फुरति ? गौतमी-- जाते, प्रतिहतममङ्गलम्‌ । सुखानि ते भर्तुकुलदेवता वित्तरन्तु । पुरोहितः- (राजानं निर्दिश्य) भो भोस्तपस्विनः, असावत्र भवान्‌ वर्णाश्रमाणां रक्षिता प्रागेव मुक्तासनो वः प्रतिपालयति । पश्यतैनम्‌ । शाङ्गरवः-- भो महाब्राह्मण, काममेतदभिनन्दनीयं तथापि वयमत्र मध्यस्थाः । कुतः-- भवन्ति नम्रास्तरवः फलागमैर्नवाम्बुभिर्दूरविलम्बिनो घनाः । अनुद्धताः सत्पुरुषाः समृद्धिभिः स्वभावं एवैष परोपकारिणाम्‌ ।।
शकुन्तला:-- (अपशकुन को सूचित कर) ओह, क्यो मेरा दाहिना नेत्र फड़क रहा है? गौतमी:-- बेटी अमंगल नष्ट हो । पतिकुल के देवता तुम्हें सुख प्रदान करें । (घूमती है) । पुरोहित:-- (राजा की ओर संकेत कर) हे हे तपस्वियो, ये (चार) वर्णो और आश्रमों के रक्षक आदरणीय महाराज पहले से ही आसन से उठकर आप लोगो की प्रतीक्षा कर रहे हैं । इन्हे देखिये अर्थात्‌ इनसे मिलिये । शाङ्गरवः-- हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, यद्यपि (महाराज का) यह (शिष्टाचार प्रदर्शन) प्रशंसनीय है, तथापि हम लोग इस विषय में उदासीन हैं क्योकि वृक्ष फल के आ जाने पर नम्न हो जाते हैं (झुक जाते हैं) । बादल नये जल से (पूर्ण होने पर) बहुत नीचे (पृथ्वी के पास) लटक जाते हैं (अर्थात्‌ बहुत नीचे तक झुक जाते हैं) । (इसी प्रकार) सज्जन समृद्धियों (को पाने) से विनग्र (हो जाते हैं) । यह परोपकारियों का स्वभाव ही है ।
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