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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 10
प्रतिहारी-- सुचरितनन्दिनि ऋषयो देवं सभाजयितुमागता इति तर्कयामि । (ततः प्रविशन्ति गौतमीसहिताः शकुन्तलां पुरस्कृत्य मुनयः । पुरश्चैषां कञ्चुकी पुरोहितश्च) । कञ्चुकी- इत इतो भवन्तः । शर्खरवः-शारद्वत, महाभागः कामं नरपतिरभिन्नस्थितिरसौ, न कश्चिद्‌ वणनिामपथमपकृष्टोऽपि भजते । तथापीद्‌ शश्रत्परिचितविविक्तेन. मनसा जनाकीर्णं मन्ये हुतवहपरीतं गृहमिव ।।
प्रतिहारी:-- (आप के) सुन्दर चरित (आचरण) से प्रसन्न ऋषि लोग महाराज का अभिनन्दन करने के लिये आये हैं - ऐसा मैं सोच रही हूँ । (तत्पश्चात्‌ शकुन्तला को आगे करके गौतमी के साथ मुनि लोग प्रवेश करते हैं । इनके आगे-आगे कञ्चुकी और पुरोहित हैं) कञ्चुकी:-- इधर से, इधर से, आप लोग (आईये) । शार्ङ्गरव:-- हे शारद्वत (मैं समझता हूँ कि) यद्यपि, मर्यादा का उलंघन न करने वाले (मर्यादा के रक्षक) ये राजा अत्यन्त श्रेष्ठ हैं और (इनके राज्य में) वर्णो में कोई नीच व्यक्ति भी कुमार्ग पर नहीं चलता, तथापि निरन्तर एकान्त के अभ्यस्त मन से, मैं लोगो से भरे हुये इस (राजमहल) को अग्नि से घिरे हुये घर की भाँति अनुभव कर रहा हूँ ।
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