प्रतिहारी:--
(आप के) सुन्दर चरित (आचरण) से प्रसन्न ऋषि लोग महाराज का अभिनन्दन करने के लिये आये हैं - ऐसा मैं सोच रही हूँ ।
(तत्पश्चात् शकुन्तला को आगे करके गौतमी के साथ मुनि लोग प्रवेश करते हैं । इनके आगे-आगे कञ्चुकी और पुरोहित हैं)
कञ्चुकी:--
इधर से, इधर से, आप लोग (आईये) ।
शार्ङ्गरव:--
हे शारद्वत (मैं समझता हूँ कि) यद्यपि, मर्यादा का उलंघन न करने वाले (मर्यादा के रक्षक) ये राजा अत्यन्त श्रेष्ठ हैं और (इनके राज्य में) वर्णो में कोई नीच व्यक्ति भी कुमार्ग पर नहीं चलता, तथापि निरन्तर एकान्त के अभ्यस्त मन से, मैं लोगो से भरे हुये इस (राजमहल) को अग्नि से घिरे हुये घर की भाँति अनुभव कर रहा हूँ ।
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