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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 20
प्रतीहारी- (स्वगतम्‌) अहो, धमपिक्षिता भर्तुः । ईदृशं नाम सुखोपनतं रूपं द्ष्ट्वा कोऽन्यो विचारयति ? शाङ्खरवः-- भो राजन्‌ किमिति जोषमास्यते ? राजा--भोस्तपोधनाः, चिन्तयन्नपि न खलु स्वीकरणमत्रभवत्याः स्मरामि । तत्क थमिमामभिव्यक्त सत्वलक्षणां प्रत्यात्मानं क्षेत्रिणमाशङ्कमानः प्रतिपत्स्ये ? शकुन्तला--(अपवार्य) आर्यस्य परिणय एव सन्देहः कुतः इदानीं मे दूराधिरोहिण्याशा ? शार्खरवः- मा तावत्‌ । कृताभिमशमिनुमन्यमानः सुतां त्वया नाम मुनिर्विमान्यः । मुष्टं प्रतिग्राहयता स्वमर्थ पात्रीकृतो दस्युरिवासि येन ।।
प्रतीहारी:-- (अपने मन में) ओह, स्वामी की धर्मनिष्ठता (धन्य है) । इस प्रकार सरलता से प्राप्त सौन्दर्य को देखकर दूसरा कोन विचार करता है ? शाङ्खरवः:-- हे राजन्‌ , क्यों इस प्रकार चुप बेठे हैं ? राजा:-- हे तपस्वियो, (प्रयत्नपूर्वक) सोचता हुआ भी मैं इन माननीय को (विवाह के रूप में) स्वीकार करने की बात का स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ। तो स्पष्टतः गर्भधारिणी इन (शकुन्तला) के प्रति अपने को पति मानता हुआ मैं कैसे इन्हे स्वीकार करूं ? शकुन्तला:-- (एक ओर मुंह कर) आर्य को विवाह में ही सन्देह है । अब मेरी दूर्‌ तक चढ़ी हुई (पराकाष्ठा को प्राप्त) आशा (महत्वाकांक्षा कहां ?) (अर्थात्‌ सम्राट्‌ की पटरानी बनने की महत्वाकांक्षा का तो कहना ही क्या) । शार्खरव:-- ऐसा मत (कहें) । (तुम्हारे द्वारा) बलपूर्वक उपभोग (बलात्कार) की गयी (अपनी) पुत्री (के गन्धर्व विवाह) को मान्यता देने वाले मुनि (कण्व) तुम्हारे द्वारा क्या (इस प्रकार) अपमान किये जाने योग्य हैं ? चुराये गये अपने (शकुन्तलारूपी) धन को समर्पित करते हुये जिनके द्वारा, चोर की भाँति तुम (योग्य) पत्र बनाये गये ।
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