प्रतीहारी:--
(अपने मन में) ओह, स्वामी की धर्मनिष्ठता (धन्य है) । इस प्रकार सरलता से प्राप्त सौन्दर्य को देखकर दूसरा कोन विचार करता है ?
शाङ्खरवः:--
हे राजन् , क्यों इस प्रकार चुप बेठे हैं ?
राजा:--
हे तपस्वियो, (प्रयत्नपूर्वक) सोचता हुआ भी मैं इन माननीय को (विवाह के रूप में) स्वीकार करने की बात का स्मरण नहीं कर पा रहा हूँ। तो स्पष्टतः गर्भधारिणी इन (शकुन्तला) के प्रति अपने को पति मानता हुआ मैं कैसे इन्हे स्वीकार करूं ?
शकुन्तला:--
(एक ओर मुंह कर) आर्य को विवाह में ही सन्देह है । अब मेरी दूर् तक चढ़ी हुई (पराकाष्ठा को प्राप्त) आशा (महत्वाकांक्षा कहां ?) (अर्थात् सम्राट् की पटरानी बनने की महत्वाकांक्षा का तो कहना ही क्या) ।
शार्खरव:--
ऐसा मत (कहें) । (तुम्हारे द्वारा) बलपूर्वक उपभोग (बलात्कार) की गयी (अपनी) पुत्री (के गन्धर्व विवाह) को मान्यता देने वाले मुनि (कण्व) तुम्हारे द्वारा क्या (इस प्रकार) अपमान किये जाने योग्य हैं ? चुराये गये अपने (शकुन्तलारूपी) धन को समर्पित करते हुये जिनके द्वारा, चोर की भाँति तुम (योग्य) पत्र बनाये गये ।
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