मुख्य पृष्ठ शास्त्र परिचय ऐप इंस्टॉल करें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 19
राजा--विशेषेणाधि्चिप्तोऽस्मि । गौतमी- जाते, महूर्तं मा लज्जस्व । अपनेष्यामि तावत्‌ तेऽ वगुण्ठनम्‌ ततस्त्वां भर्ताऽभिनज्ञास्यति । राजा-- (शकुन्तलां निर्वर्ण्य । आत्मगतम्‌) -- इदमुपनतमेवं रूपमक्लिष्टकान्ति प्रथमपरिगृहीतं स्यान्न वेत्यव्यवस्यन्‌ । भ्रमर इव विभाते कुन्दमन्तस्तुषार नच खलु परिभोक्तुं नैव शक्रोमि हातुम्‌ ।।
राजा:-- (इस आरोप से) मैं विशेषरूप से तिरस्कृत हआ हूँ । गौतमी:- - बेटी, थोड़ी देर के लिये लज्जा मत करो । मैं तुम्हारे घूँघट को हटाती हूँ । तब (तुम्हारा) पति तुमको पहचानेगा । (कहे गये के अनुसार करती है अर्थात्‌ घूँघट को हटाती है) । राजा:-- (शकुन्तला को देखकर, अपने मन में) इस प्रकार (स्वतः ही) प्राप्त हुये (उपस्थित) इस अम्लान कान्ति वाले सौन्दर्य को मैंने पहले स्वीकार किया है अथवा नहीं - इस बात का निश्चय न कर पाता हुआ भी, प्रातःकाल में, भीतर हिम-कणों से युक्त कुन्द पुष्प को भ्रमर की भाँति, न तो (इसका) उपभोग करने में हूँ न ही (इसे) छोडने में ही समर्थ हो पा रहा हूँ ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।

सभी अध्याय उपलब्ध

अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।

सरल अर्थ

प्रत्येक श्लोक के साथ स्पष्ट हिंदी अनुवाद।

ऑफलाइन पढ़ें

इंटरनेट के बिना भी ग्रंथ पढ़ें।
Krishjan
धर्म का अन्वेषण
ऐप इंस्टॉल करें