राजा:--
(इस आरोप से) मैं विशेषरूप से तिरस्कृत हआ हूँ ।
गौतमी:- -
बेटी, थोड़ी देर के लिये लज्जा मत करो । मैं तुम्हारे घूँघट को हटाती हूँ । तब (तुम्हारा) पति तुमको पहचानेगा । (कहे गये के अनुसार करती है अर्थात् घूँघट को हटाती है) ।
राजा:--
(शकुन्तला को देखकर, अपने मन में) इस प्रकार (स्वतः ही) प्राप्त हुये (उपस्थित) इस अम्लान कान्ति वाले सौन्दर्य को मैंने पहले स्वीकार किया है अथवा नहीं - इस बात का निश्चय न कर पाता हुआ भी, प्रातःकाल में, भीतर हिम-कणों से युक्त कुन्द पुष्प को भ्रमर की भाँति, न तो (इसका) उपभोग करने में हूँ न ही (इसे) छोडने में ही समर्थ हो पा रहा हूँ ।
पूरा ग्रंथ पढ़ें
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के सभी अध्याय और श्लोकों को उनके अर्थ और व्याख्या सहित पढ़ने के लिए Krishjan ऐप इंस्टॉल करें। ऐप में आपको संरचित अध्याय, आसान नेविगेशन और ऑफलाइन पढ़ने की सुविधा मिलती है।
सभी अध्याय उपलब्ध
अभिज्ञानशाकुन्तलम् के 18 अध्याय और सभी श्लोक एक ही स्थान पर।