(ततः प्रविशति कञ्चुकी)
कञ्चुकी--अहो नु खल्वीदृशीमवस्थां प्रतिपन्नोऽस्मि !
आचार इत्यवहितेन मया गृहीता या वेत्रयष्टिरवरोधगृहेषुं राज्ञः । | काले गते बहुतिथे मम सैव जाता प्रस्थानविक्लवगतेरवलम्बनार्था।।
( तत्पश्चात् कञ्चुकी प्रवेश करता है )
कञ्चुकी:--
ओह, मैं, (अब) ऐसी अवस्था को प्राप्त हो गया (पहुंच गया) हूँ । राजा के अन्तःपुर में (यह) नियम (परम्परा) है, में (मानकर) शक्तिसम्पन्न (समर्थ) (भी) मेरे द्वारा जो बेंत की छड़ी ग्रहण (धारण) की गयी थी, वही (बेंत की छड़ी) अधिक समय के बीत जाने पर (इस वृद्धावस्था से) चलने मे लड़खड़ाई हुई गति वाले (अर्थात् चलने में असमर्थ) मेरे लिये सहारा की वस्तु हो (बन) गयी है ।
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