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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 31
(सर्वे विस्मयं रूपयन्ति) राजा-- भगवन्‌ , प्रागपि सोऽस्माभिरर्थः प्रत्यादिष्ट एव । किं वृथा तर्केणाव्विष्यते विश्राम्यतु भवान्‌ । पुरोहितः- (विलोक्य) विजयस्व । (इति निष्क्रान्तः) । राजा- वेत्रवति, प्यकुलोऽस्मि । शयनभूमिमार्गमादेशय । प्रतीहारी--इत इतो देवः । (इति प्रस्थिता) । कामं प्रत्यदिष्टां स्मरामि न पेरियरहं मुनेस्तनयाम्‌ । बलवत्तु दूयमानं - श्रत्यायरयेतीव मां हदयम्‌ ।। (इति निष्क्रान्ताः सर्वे) ।। इति पञ्चमोऽङ्कः ।।
(सभी लोग आश्चर्य का अभिनय करते हैं) राजा:-- भगवन्‌ , पहले भी हम लोगों द्वारा उस (शकुन्तला रूप) वस्तु का निराकरण कर दिया गया था । (अब) आप व्यर्थ के तर्क से (उसको) क्यों खोजते हैं ? आप विश्राम कीजिये । पुरोहित:-- (देखकर) आप की विजय हो । ( निकल जाता है ) । राजा:-- वेत्रवती, मैं व्याकुल हो गया हूँ । शयन स्थान का मार्ग बताओ । प्रतीहारी:-- महाराज, ईधर से, इधर से (आईये) । (चल पड़ती है) राजा:-- (मन में) यद्यपि परित्यक्त (तिरस्कृत) की गयी मुनि-पुत्री (शकुन्तला) को पत्नी के रूप में (ग्रहण करने की बात को) नहीं स्मरण कर पा रहा हूँ; तथापि अत्यधिक दुःखित होता हुआ (मेरा) हृदय मुझको मानो विश्वास दिला रहा है (कि वह मेरी पत्नी है)। (सभी निकल जाते हैं) ॥ पञ्चम अंक समाप्त ॥
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