(सभी लोग आश्चर्य का अभिनय करते हैं)
राजा:--
भगवन् , पहले भी हम लोगों द्वारा उस (शकुन्तला रूप) वस्तु का निराकरण कर दिया गया था । (अब) आप व्यर्थ के तर्क से (उसको) क्यों खोजते हैं ? आप विश्राम कीजिये ।
पुरोहित:--
(देखकर) आप की विजय हो । ( निकल जाता है ) ।
राजा:--
वेत्रवती, मैं व्याकुल हो गया हूँ । शयन स्थान का मार्ग बताओ ।
प्रतीहारी:--
महाराज, ईधर से, इधर से (आईये) । (चल पड़ती है)
राजा:--
(मन में) यद्यपि परित्यक्त (तिरस्कृत) की गयी मुनि-पुत्री (शकुन्तला) को पत्नी के रूप में (ग्रहण करने की बात को) नहीं स्मरण कर पा रहा हूँ; तथापि अत्यधिक दुःखित होता हुआ (मेरा) हृदय मुझको मानो विश्वास दिला रहा है (कि वह मेरी पत्नी है)।
(सभी निकल जाते हैं)
॥ पञ्चम अंक समाप्त ॥
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