(समीप जाकर) जय हो, महाराज की जय हो । ये हिमालय की तराई के जङ्गल में रहने वाले तपस्वी लोग स्त्रियो के साथ (महर्षि) कण्व का सन्देश लेकर आये हैं । सुनकर महाराज ही (निर्णय के विषय में) प्रमाण हैं (अर्थात् आप जेसी आज्ञा दे वैसा किया जाय) ।
राजा:--
(आदर के साथ) क्या कण्व के सन्देश को लेकर आये हैं ?
कञ्चुकी:--
जी हां।
राजा:--
तो मेरी आज्ञा से आचार्य सोमरात सूचित किये जायें (अर्थात् आचार्य सोमरात से कहो) कि इन आश्रमवासियों का वेदिक विधि से सत्कार कर स्वयं ही (उन्हे) अन्दर ले आएं । मैं भी यहाँ तपस्वियों के दर्शन योग्य स्थान में स्थित हुआ (बैठा हुआ) प्रतीक्षा करता हूँ ।
कञ्चुकी:--
महाराज जो आज्ञा । (निकल जाता है) ।
राजा:--
(उठकर) वेत्रवती, यज्ञशाला (अग्निशरण) का मार्ग बताओ ।
प्रतिहारी:--
महाराज, इधर से, इधर से (आईये) ।
राजा:--
(चारो ओर घुमता है । अधिकार की खिन्नता का अभिनय कर) सभी प्राणी अपनी अभीष्ट वस्तु को प्राप्त कर सुखी होते हैं । किन्तु राजा को सफलता दुःखान्त (कष्टप्रद) ही होती है । उच्च-पद पर (राज्य-पद् इत्यादि) की प्राप्ति केवल उत्सुकता (अभिलाषा) को समाप्त (पूर्ण) करती है, किन्तु प्राप्त (राज्यादि) की रक्षा का कार्य इस (प्राप्त-कर्ता) को कष्ट देता है । (अपने हाथ में ली गयी है दण्ड-व्यवस्था जिसकी ऐसा) राज्य, अपने हाथ में धारण किये हुये दण्ड वाले (अर्थात् जिसका दण्ड अपने हाथ मे पकड़ लिया गया है, ऐसे) छाते की भाँति थकान को दूर करने के लिये (उतना) नहीं (होता), जितना थकान (उत्पन्न करने) के लिये (होता है) ।
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