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अभिज्ञानशाकुन्तलम् • अध्याय 5 • श्लोक 6
(उपगम्य) जयतु जयतु देवः ! एते खलु हिमगिरेरुपत्यकारण्यवासिनः काश्यपसन्देशमादाय सख्रीकास्तपस्विनः सम्प्राप्ताः । श्रुत्वा देवः प्रमाणम्‌ । राजा--(सादरम्‌) कि काश्यपसन्देशहारिणः ? कञ्चुकी--अथ किम्‌ । राजा- तेन हि मद्वचनाद्‌ विज्ञाप्यतामुपाध्यायः सोमरातः । अमूनाश्रमवासिनः श्रौतेन विधिना सत्कृत्य स्वयमेव प्रवेशयितुमर्हतीति । अहमप्यत्र तपस्विदरनोचिते प्रदेशो स्थितः प्रतिपालयामि । कञ्चुकी-- यदाज्ञापयति देवः । (इति निष्क्रान्तः) राजा-(उत्थाय) वेत्रवति, अग्निशरणयार्गमादेशय । प्रतिहारी- इतो इतो देवः । राजा- (परिक्रामति । अधिकारखेदं निरूप्य) सर्वः प्रार्थितमर्थमधिगम्य सुखी सम्पद्यते जन्तुः । राज्ञा तु चरितार्थता दुःखोत्तरैव । ओत्सुक्यमात्रमवसाययति प्रतिष्ठा क्लिश्नाति लब्धपरिपालनवृत्तिरेनम्‌ । नातिश्रमापनयनाय यथा श्रमाय राज्यं स्वहस्तधृतदण्डमिवातपत्रम्‌ ।।
(समीप जाकर) जय हो, महाराज की जय हो । ये हिमालय की तराई के जङ्गल में रहने वाले तपस्वी लोग स्त्रियो के साथ (महर्षि) कण्व का सन्देश लेकर आये हैं । सुनकर महाराज ही (निर्णय के विषय में) प्रमाण हैं (अर्थात्‌ आप जेसी आज्ञा दे वैसा किया जाय) । राजा:-- (आदर के साथ) क्या कण्व के सन्देश को लेकर आये हैं ? कञ्चुकी:-- जी हां। राजा:-- तो मेरी आज्ञा से आचार्य सोमरात सूचित किये जायें (अर्थात्‌ आचार्य सोमरात से कहो) कि इन आश्रमवासियों का वेदिक विधि से सत्कार कर स्वयं ही (उन्हे) अन्दर ले आएं । मैं भी यहाँ तपस्वियों के दर्शन योग्य स्थान में स्थित हुआ (बैठा हुआ) प्रतीक्षा करता हूँ । कञ्चुकी:-- महाराज जो आज्ञा । (निकल जाता है) । राजा:-- (उठकर) वेत्रवती, यज्ञशाला (अग्निशरण) का मार्ग बताओ । प्रतिहारी:-- महाराज, इधर से, इधर से (आईये) । राजा:-- (चारो ओर घुमता है । अधिकार की खिन्नता का अभिनय कर) सभी प्राणी अपनी अभीष्ट वस्तु को प्राप्त कर सुखी होते हैं । किन्तु राजा को सफलता दुःखान्त (कष्टप्रद) ही होती है । उच्च-पद पर (राज्य-पद्‌ इत्यादि) की प्राप्ति केवल उत्सुकता (अभिलाषा) को समाप्त (पूर्ण) करती है, किन्तु प्राप्त (राज्यादि) की रक्षा का कार्य इस (प्राप्त-कर्ता) को कष्ट देता है । (अपने हाथ में ली गयी है दण्ड-व्यवस्था जिसकी ऐसा) राज्य, अपने हाथ में धारण किये हुये दण्ड वाले (अर्थात्‌ जिसका दण्ड अपने हाथ मे पकड़ लिया गया है, ऐसे) छाते की भाँति थकान को दूर करने के लिये (उतना) नहीं (होता), जितना थकान (उत्पन्न करने) के लिये (होता है) ।
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